Author Topic: Untracked Tourist Spot In Uttarakhand - अविदित पर्यटक स्थल  (Read 5107 times)

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Online पंकज सिंह महर

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        मनेला ग्लेशियर से बना हुआ आकर्षक और मनोहरी मैदान है, यहीं पर काली और कुटी नदियों का संगम होता है। यह अत्यन्त प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों में माना जाता है। मैदान के किनारे पहाड़ की जड़ पर व्यास मुनी का मंदिर है। इस मंदिर के ऊपर एक महादेव का प्रसिद्ध मंदिर है। व्यास घाटी व्यास मुनि के नाम से जानी जाती है। सम्पूर्ण शौका जनजाति महर्षि वेदव्यास को अपना पूर्वज मानती है। इस क्षेत्र में वेदव्यास की पूजा होती है।
       मनेला में महर्षि व्यास जी के मंदिर के समक्ष रक्षावंधन के पुनीत पर्व पर दो दिन का मेला लगता है। मेला शुरु होने से पहले रात्रि - जागरण, कीर्तन, भजन, खेलकूद और लोकनृत्य गीतों का आयोजन शुरु हो जाता है। पूर्णमासी के दिन मुख्य मेला लगता है, दूर-दूर के लोग मेले में आते हैं, व्यास क्षेत्र का यह तो प्रमुख मेला है, जिसमें प्रत्येक व्यास भक्त उपस्थित होना अपना सौभाग्य समझता है।
      
     यहाँ की एक विशेषता और है, व्यासमंदिर के १५० गज की दूरी पर पश्चिम-उत्तर की दिशा में एक छीटी सी गुफा है, जिसमें ९ साँप एक ही साथ रहते हैं। ये सफेद, काले और सफेद-काले मिश्रित रंग के हैं। ये धूप सेंकने के लिए एक साथ बाहर आते हैं, यहाँ के लोग इन्हें दूध पिलाकर शिव के गण के रुप में पूजते हैं। ये कभी किसी का नुकसान नहीं करते बल्कि मनौती करनेवाले लोगों को बाहर निकलकर आशीर्वाद देते हैं। यहाँ सामूहिक पूजा होती है। इस मेले में व्यासपट्टी के आकर्षण लोकनृत्यों का प्रदर्शन होता है, जिन नृत्यों तो देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं।
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लिथलाकोट : पिथौरागढ़
« Reply #16 on: April 24, 2008, 05:12:06 PM »
लिथलाकोट (तिलथिन) - पिथौरागढ़ की चौंदास पट्टी के आबाद स्थानों में लिथलाकोट सबसे ऊँचे स्थानों पर स्थित है। चौंदास क्षेत्र के इष्टदेव 'स्यंसै' इसी लिथलाकोट की चोटी पर पूजे जाते हैं। इस चोटी के एक ओर मंदिर है। शौका लोगों का मानना है कि उनके पूर्वजों का निवास स्थान यहीं था। लिथलाकोट चोटी के चारों तरफ नीचे ढ़लानों पर चौदास के सारे गाँव बसे हैं।
       पहाड़ के पीछे एक प्राचीन राजमहल के खण्डहर आज भी दिखाई देते हैं। यह स्थान अपनी सुन्दरता के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के रंग-बिरंगे फूल, मखमली घास और बाँस और देवदार के वृक्ष इतने सुन्दर हैं कि देश-विदेश के सैकड़ों पर्यटक यहाँ की सुन्दरता देखने लिथलाकोट पहुँचते हैं।
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कुटी - धारचूला तहसील का कुटी आखरी गाँव है, ५,४४५ मीटर की ऊँचाई पर यह गाँव स्थित है। यह स्थान अपनी प्राकृतिक सुन्दरता के लिए विख्यात है। पिथौरागढ़ की लोककथाओं में इस स्थान को कैलास धाम माना गया है।
       यह स्थान किसी शौका सामन्त राजा की राजधानी भी रहा है। यहाँ आज भी खसकोट के खण्डहर हैं, जिससे ज्ञात होता है कि यहाँ पहले किसी न किसी प्रभावशाली राजा का किला रहा होगा। कुटी में एक अद्भुत पत्थर है, जिसके बीच में एक १.५ फीट व्यास का विवर (छेद) है, लोगों का यह मानना है कि जो व्यक्ति इस छेद को पार कर जाए वही धर्मात्मा है। जो पार न कर सके उसे पापी व अधर्मी समझा जाता है। ग्लेशियर के द्वारा निर्मित समतल पठार पर बसा हुआ कुटी गाँव सम्पूर्ण पिथौरागढ़ का आकर्षण क्षेत्र है। इसके चारों ओर हिमाच्छादित पहाड़ दिखाई पड़ता है।
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भुवाली से भीमताल की ओर कुछ दूर चलने पर बायीं तरफ का रास्ता रामगढ़ की ओर मुड़ जाता है।  यह मार्ग सुन्दर है।  इस भुवाली - मुक्तेश्वर मोटर-मार्ग कहते हैं।  कुछ ही देर में २३०० मीटर की ऊँचाई वाले 'गागर' नामक स्थान पर जब यात्रीगण पहुँचते हैं तो उन्हें हिमालय के दिव्य दर्शन होते हैं। 'गागर' नामक पर्वत क्षेत्र में 'गर्गाचार्य' ने तपस्या की थी, इसीलिए इस स्थान का नाम 'गर्गाचार्य' से अपभ्रंश होकर 'गागर' हो गया।  'गागर' की इस चोटी पर गर्गेश्वर महादेव का एक पुराना मन्दिर है।  'शिवरात्रि' के दिन यहाँ पर शिवभक्तों का एक विशाल मेला लगता है।
'गागर' से मल्ला रामगढ़ केवल ३ कि.मी. की दूरी पर समुद्रतल से १७८९ मीटर की ऊँचाई पर स्थित है।  नैनीताल से केवल २५ कि.मी. की दूरी पर रामगढ़ के फलों का यह अनोखा क्षेत्र बसा हुआ है।  कुमाऊँ क्षेत्र में सबसे अधिक फलों का उत्पादन भुवाली -     रामगढ़ के आसपास के क्षेत्रों में होता है।  इस क्षेत्र में अनेक प्रकार के फल पाये जाते हैं।  बर्फ पड़ने के बाद सबसे पहले ग्रीन स्वीट सेब और सबसे बाद में पकने वाला हरा पिछौला सेब होता है।  इसके अलावा इस क्षेत्र में डिलिशियस, गोल्डन किंग, फैनी और जोनाथन जाति के श्रेष्ठ वर्ग के सेब भी होते हैं।  आडू यहाँ का सर्वोत्तम फल है।  तोतापरी, हिल्सअर्ली और गौला कि का आडू यहाँ बहुत पैदा किया जाता है।  इसी तरह खुमानियों की भी मोकपार्क व गौला कि बेहतर ढ़ंग से पैदा की जाती है।  पुलम तो यहाँ का विशेष फल हो गया है।  ग्रीन गोज जाति के पुलम यहाँ बहुत पैदा किया जाते हैं।
       रामगढ़, जहाँ अपने फलों के लिए विख्यात है, वहाँ यह अपने नैसर्गिक सौन्दर्य के लिए भी प्रसिद्ध है। हिमालय का विराट सौन्दर्य यहां से साफ-साफ दिखाई देता है।  रामगढ़ की पर्वत चोटी पर जो बंगला है, उसी में एक बार विश्वकवि रवीन्द्र नाथ टैगोर आकर ठहरे थे।  उन्होंने यहाँ से जो हिमालय का दृश्य देका तो मुग्ध हो गए और कई दिनों तक हिमालय के दर्शन इृसी स्थान पर बैठकर करते रहे।  उनकी याद में बंगला आज भी 'टैगोर टॉप' के नाम से जाना जाता है। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु को भी रामगढ़ बहुत पसन्द था।  कहते हैं आचार्य नरेन्द्रदेव ने बी अपने 'बौद्ध दर्शन' नामक विख्यात ग्रन्थ को अन्तिम रुप यहीं आकर दिया था।  साहित्यकारों को यह स्थान सदैव अपनी ओर आकर्षित करता रहा है।  स्व. महादेवी वर्मा, जो आधुनिक हिन्दी साहित्य की मीरा कहलाती हैं, को तो रामगढ़ भाया कि वे सदैव ग्रीष्म ॠतु में यहीं आकर रहती थीं।  उन्होंने अपना एक छोटा सा मकान भी यहाँ बनवा लिया था।  आज भी यह भवन रामगढ़-मुक्तेश्वर मोटर मार्ग के बायीं ओर बस स्टेशन के पीछे वाली पहाड़ी पर वृक्षों के बीच देखा जा सकता है।  जीवन के अन्तिम दिनों में वे पहाड़ पर नहीं आ सकती थीं।  अत: उन्होंने मृत्यु से कुछ पहले इस मकान को बेचा था।  परन्तु उनकी आत्मा सदैव इस अंचल में आने के लिए सदैव तत्पर रहती थी।   ऐसे ही अनेक ज्ञात और अज्ञात साहित्य - प्रेमी हैं, जिन्हें रामगढ़ प्यारा लगा था और बहुत से ऐसे प्रकृति - प्रेमी हैं जो बिना नाम बताए और बिना अपना परिचय दिए भी इन पहाड़ियों में विचरम करते रहते हैं।
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'रानीबाग' से पहले इस स्थान का नाम चित्रशिला था। कहते हैं कत्यूरी राजा पृथवीपाल की पत्नी रानी जिया यहाँ चित्रेश्वर महादेव के दर्शन करने आई थी। वह बहुत सुन्दर थी। रुहेला सरदार उसपर आसक्त था। जैसे ही रानी नहाने के लिए गौला नदी में पहुँची, वैसे ही रुहेलों की सेना ने घेरा डाल दिया। रानी जिया शिव भक्त और सती महिला थी। उसने अपने ईष्ट का स्मरण किया और गौला नदी के पत्थरों में ही समा गई। रुहेलों ने उन्हें बहुत ढूँढ़ा परन्तु वे कहीं नहीं मिली। कहते हैं, उन्होंने अपने आपको अपने घाघरे में छिपा लिया था। वे उस घाघरे के आकार में#ं ही शिला बन गई थीं। गौला नदी के किनारे आज भी एक ऐसी शिला है, जिसका आकार कुमाऊँनी घाघरे के समान हैं। उस शिला पर रंग-विरंगे पत्थर ऐसे लगते हैं - नानो किसी ने रंगीन घाघरा बिछा दिया हो। वह रंगीन शिला जिया रानी के स्मृति चिन्ह माना जाता है। रानी जिया को यह स्थान बहुत प्यारा था। यहीं उसने अपना बाग लगाया था और यहीं उसने अपने जीवन की आखिरी सांस भी ली थी। वह सदा के लिए चली गई परन्तु उसने अपने गात पर रुहेलों का हाथ नहीं लगन् दिया था। तब से उस रानी की याद में यह स्थान रानीबाग के नाम से विख्यात है।
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Online हेम पन्त

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Re: UNKNOWN & UNTRACKED TOURIST SPOTS OF UK
« Reply #20 on: April 24, 2008, 06:01:01 PM »
पंकज दा! इतनी सारे महत्वपूर्ण दर्शनीय स्थलों की जानकारी देने के लिये शुक्रिया... +1 कर्मा भी
मैंने न कभी देखा तुमको, पर प्राण तुम्हारी वह छाया- जो रहती है मेरे उर में, वह सुन्दर है पावन सुन्दर!  कविवर चन्द्र कुंवर बर्त्वाल

Online Lalit Mohan Pandey

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Re: UNKNOWN & UNTRACKED TOURIST SPOTS OF UK
« Reply #21 on: April 24, 2008, 06:20:08 PM »
Narayan Ashram

Narayan Ashram is situated at at an elevation of 2734 mts. above sea level.  It can be reached from Pithoragarh via kanalichhina (25km) Ogla(44 km), Jauljibi(77km), Dharchula(94km), Tawaghat (108km). Tawaghat is the place where Dhauliganga and Kaliganga meet.

From Tawaghat, 10 kms road is good two lane road due to construction of the Dam on the river Dhauliganga. New Sobla town (approx 10 kms from Tawaghat) onwards the road is very narrow, steep and muddy with chances of landslides at some places. 25 kms approx from New Sobla Town on this road. So the driver has to be careful !
 
The ashram was established by Sri Narayan Swami in 1936. It can accommodate at the most 40 persons at a time. During winter season the ashram remains closed due to heavy snowfall. And rainy season may cause damage to the road. Ashram keeps on conducting various social - spiritual activities for the members so the visitors are strictly advised to convey about their plan to the ashram well in advance.

Although I have never been to this place, but i have heard "this is one of the most beautiful and peaceful place", you will find yourself standing next to "Kailash parwat" in a touching distance, with a beautiful view of snow all around, there are lots of flowers around the ashram.
 
हे गोरिल देवता..! मेरा पहाड़स शराब भटी बचो..

Online पंकज सिंह महर

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Re: UNKNOWN & UNTRACKED TOURIST SPOTS OF UK
« Reply #22 on: April 25, 2008, 10:26:27 AM »
गिरी ताल
काशीपुर शहर से रामनगर की ओर तीन किलोमीटर चलने के बाद दाहिनी ओर एक ताल है, जिसके निकट चामुण्डा का भव्य मन्दिर है।  इस ताल को गिरिताल के नाम से जाना जाता है।  धार्मिक दृष्टि से इस ताल की विशेष महत्ता है, प्रत्येक पर्व पर यहाँ दूर-दूर से यात्री आते हैं।  इस ताल से लगा हुआ शिव मन्दिर तथा संतोषी माता का मन्दिर है जिसकी बहुत मान्यता है।  काशीपुर में नागनाथ मन्दिर, मनसा देवी का मन्दिर भी धार्मिक दृष्टि से आए हुए यात्री का दिल मोह लेते हैं।
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Re: UNKNOWN & UNTRACKED TOURIST SPOTS OF UK
« Reply #23 on: April 25, 2008, 10:27:36 AM »
द्रोण सागर : काशीपुर

चैती मेला स्थल से काशीपुर की ओर २ किलोमीटर आगे नगर से लगभग जुड़ा हुआ एक महत्वपूर्ण ताल द्रोण सागर है।  पांडवों से इस ताल का सम्बन्ध बताया जाता है कि गुरु द्रोण ने यहीं रहकर अपने शिष्यों को धनुर्विद्या की शिक्षा दी थी।  ताल के किनारे एक पक्के टीले पर गुरु द्रोण की एक प्रतिमा है, ऐतिहासिक व धार्मिक दृष्टिकोण से यह विशिष्ट पर्यटन स्थल है।
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Re: UNKNOWN & UNTRACKED TOURIST SPOTS OF UK
« Reply #24 on: April 25, 2008, 10:29:35 AM »
Narayan Ashram

Narayan Ashram is situated at at an elevation of 2734 mts. above sea level.  It can be reached from Pithoragarh via kanalichhina (25km) Ogla(44 km), Jauljibi(77km), Dharchula(94km), Tawaghat (108km). Tawaghat is the place where Dhauliganga and Kaliganga meet.

From Tawaghat, 10 kms road is good two lane road due to construction of the Dam on the river Dhauliganga. New Sobla town (approx 10 kms from Tawaghat) onwards the road is very narrow, steep and muddy with chances of landslides at some places. 25 kms approx from New Sobla Town on this road. So the driver has to be careful !
 
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श्री कैलाश नारायण आश्रम - यह आश्रम भारत विख्यात हो चुका है। स्वामी श्री १०८ नारायण स्वामी ने इसकी स्थापना १९३६ में की थी, उन्हीं के नाम से यह आश्रम प्रसिद्ध हो गया है।
       चौबासपट्टी के सोसा गाँव से ४२-४२ किमी. पूरब की ओर २७०० मीटर की ऊँचाई पर यह आक्श्रम स्थित है। यह अत्यन्त रमणीय स्थल है, यहाँ पर स्वामी जी ने एक भव्य मंदिर बनवाया है। कई भवन बनवाये हैं। उद्यान और फूलों के बगीचे भी लगवाये। इस स्थान की सुन्दरता इतनी अधिक है कि देश के कोने-कोने के प्रकृति प्रेमी इस आश्रम में रहकर हिमालय के अद्भुत दर्शन करते हैं।
       इस आश्रम से कैलाश मानसरोवर जाने के लिए मार्ग है। चीन की सीमा यहाँ से अतिनिकट है। विश्व प्रसिद्ध भूगोलवेता स्वामी प्रणवानन्द इसी आश्रम में रहते हैं और यहीं से वे कई बार कैलास मानसरोवर की यात्रा कर चुके हैं।



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Online एम.एस. मेहता /M S Mehta

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Re: UNKNOWN & UNTRACKED TOURIST SPOTS OF UK
« Reply #25 on: April 25, 2008, 10:31:02 AM »
Pandakholi..

Pandakholi is in Dwarahaat side (Almora). This place is almost 15 km away from mous temple Dronagiri.  It is said the during the Agyaat Vas (Exile) one of the brothers of Pandava Bheem used to come there to take rest. I have visited this place.

पांडूखोलीः पांडुखोली की गुफाएं द्वाराहाट से 27 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं।

यह माना जाता है कि यह गुफा पांडू के पुत्र पांडवों के शरणस्थलों में से एक है। यह उस समय की बात है जब वे 14 साल के वनवास के बाद एक साल के अज्ञातवास के दौरान छुपे हुए थे, जैसा कि महाभारत में वर्णित है।

पांडुखोली नाम भी इसी कथानक से लिया गया है। पांडव का मतलब पांडू के पुत्र और खोली का मतलब आवास।

जगह कुकूछीना से 5 किलोमीटर पर है, जहां मोटरगाड़ी से पहुंचा जा सकता है।

« Last Edit: April 26, 2008, 04:35:48 PM by M S Mehta »
"जय १००८ मूल मूलनारायण जी की जय हो" !!
 

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« Reply #26 on: April 25, 2008, 10:39:46 AM »
कालीमठ, अल्मोड़ा

यह अल्मोड़ा से ५ कि.मी. की दूरी पर स्थित है।  एक ओर हिमालय का रमणीय दृश्य दिखाई देता है और दूसरी ओर से अल्मोड़ा शहर की आकर्षक छवि मन को मोह लेती है।  प्रकृतिप्रेमी, कला प्रेमी और पर्यटक इस स्थल पर घण्टों बैठकर प्रकृति का आनन्द लेते रहते हैं।  गोरखों के समय राजपंडित ने मंत्र बल से लोहे की शलाकाओं को भ कर दिया था।  लोहभ के पहाड़ी के रुप में इसे देखा जा सकता है।
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Re: UNKNOWN & UNTRACKED TOURIST SPOTS OF UK
« Reply #27 on: April 25, 2008, 10:40:50 AM »
ब्राइट एण्ड कार्नर :

यह अल्मोड़ा के बस स्टेशन से केवल २ कि.मी. कब हूरी पर एक अद्भुत स्थल है।  इस स्थान से उगते हुए और डूबते हुए सूर्य का दृश्य देखने हजारों मील से प्रकृति प्रेमी आते रहते हैं।
इंगलैण्ड में 'ब्राइट बीच' है।  उस 'बीच' से भी डूबते और उगते सूरज का दृश्य चमत्कारी प्रभाव डालने वाला होता है।  उसी 'बीच' के नाम पर अल्मोड़ा के इस 'कोने' का नाम रखा गया है।
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« Reply #28 on: April 25, 2008, 10:42:20 AM »
गरम पानी

कैंची से आगे 'गरमपानी' नामक एक छोटा सा नगर आता है।  यह स्थान हल्द्वानी, काठगोदाम और अल्मोड़ा के बीच का ऐसा स्थान है जहाँ पर यात्री चाय पीने और भोजन करने के लिए आवश्यक रुप से रुकते हैं।  गरमपानी का पहाड़ी भोजन प्रसिद्ध है।  यहाँ का रायता और आलू के हल्दी से रंग गुटके दूर-दूर तक प्रसिद्ध है।  हरी सब्जियों की यह मण्डी है।  यहाँ से दूर-दूर तक पहाड़ी सब्जियाँ भेजी जाती हैं।  पहाड़ी खीरे, मूली और अदरक आदि के लिए भी गरमपानी विख्यात  है।
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« Reply #29 on: April 25, 2008, 10:45:26 AM »
कैंची मन्दिर, रातीघाट

कैंची, भुवाली से ७ कि.मी. की दूरी पर भुवालीगाड के बायीं ओर स्थित है।  नीम करौली बाबा को यह स्थान बहुत प्रिय था।  प्राय: हर गर्मियों में वे यहीं आकर निवास करते थे।  बाबा के भक्तों ने इस स्थान पर हनुमान का भव्य मन्दिर बनवाया।  उस मन्दिर में हनुमान की मूर्ति के साथ-साथ अन्य देवताओं की मूर्तियाँ भी हैं।  अब तो यहाँ पर बाबा नीम करौली की भी एक भव्य मूर्ति स्थापित कर दी गयी है।
कैंची मन्दिर में प्रतिवर्ष १५ जून को वार्षिक समारोह मानाया जाता है।  उस दिन यहाँ बाबा के भक्तों की विशाल भीड़ लगी रहती है।  नवरात्रों में यहाँ विशेष पूजन होता है।  नीम करौली बाबा सिद्ध पुरुष थे।  उनकी सिद्धियों के विषय में अनेक कथाएँ प्रसिद्ध हैं।  कहते हैं कि बाबा पर हनुमान की विशेष कृपा थी।  हनुमान के कारण ही उनकी ख्याति प्राप्त हुई थी।  वे जहाँ जाते थे वहीं हनुमान मन्दिर बनवाते थे।  लखनऊ का हनुमान मन्दिर भी उन्होंने ही बनवाया था।  ऐसा कहा जाता है कि बाबा को 'हनुमान सिद्ध' था।
      उनका नाम नीम करौली पड़ने के सम्बन्ध में एक कथा कही जाती है।  बहुत पहले बाबा एक साधारण व्यक्ति थे।  नीम करौली गाँव में रहकर हनुमान की साधना करते थे, एक बार उन्हें रेलगाड़ी में बैठने की इच्छा हुई।  नीम करौली के स्टेशन पर जैसे ही गाड़ी रुकी, बाबाजी रेल के प्रथम श्रेणी के डिब्बे में जाकर बैठ गए।  कंडक्टर गार्ड को जैसे ही ज्ञात हुआ कि बाबाजी बिना टिकट के बैठे हैं तो उन्होंने कहा कि बाबाजी, आप गाड़ी से उतर जाएँ।  बाबाजी मुस्कुराते हुए गाड़ी के डिब्बे से उतरकर स्टेशन के सामने ही आसन जमाकर बैठ गए।  उधर गार्ड ने सीटी बजाई, झंडी दिखाई और ड्राइवर ने गाड़ी चलाने का सारा उपक्रम किया, किन्तु गा#ी एक इंच भी आगे न बढ़ सकी।  लोगों ने गार्ड से कहा कि कंडक्टर गार्ड ने बाबाजी से अभद्रता की है।  इसीलिए उनके प्रभाव के कारण गाड़ी आगे नहीं सरक पा रही है।  परन्तु रेल कर्मचारियों ने बाबा को ढोंगी समझा।   गाड़ी को चलाने के लिए कई कोशिशें की गयीं।  कई इंजन और लगाए गए परन्तु गाड़ी टस से मस तक न हुई।  अन्त में बाबा की शरण में जाकर कंडक्टर, गार्ड और ड्राइवर ने क्षमा माँगी।  उन्हें आदर से प्रथम श्रेणी के डिब्बे में बिठाया।  जैसे ही बाबा डिब्बे में बैठे, वैसे ही गाड़ी चल पड़ी।  तब से बाबा 'नीम करौली बाबा' पड़ा।  तब से अपने चमत्कारों के कारण वे सब जगह विख्यात हो गये थे।   अपनी मृत्यु की अन्तिम तिथि तक भी वे हनुमान के मन्दिरों को बनवाने का कार्य करते रहे और दु:खी व्यक्तियों की सेवा करते रहे।
       कैंची में भी कई दुखियों की उन्होंने सेवा की थी।  उनके पास कोई व्यक्ति क्यों आया है?  यह बात वे पहले ही कहकर आगंतुक को आश्चर्य में डाल देते थे।  आज भी बाबा के नाम पर कैंची में भोज का आयोजन होता है।
यो नै हुन, ऊ नै हुन! कै बेर, कै नै हुन|
सीर पाणी की वां फुटेली, जां मारुंला लाता|
लश्का कमर बांधा, हिम्मत का साथा.....!

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