Author Topic: Neellkanth Parvat Uttarakhand,नीलकंठ पर्वत पर विराजते हैं शिव !  (Read 465 times)

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‘नीलकंठ पहाड़ी’ उत्तराखंड में है। यह नाम इसके स्वरूप के आधार पर पड़ा। दरअसल ऊंचे शिखर का एक हिस्सा ऐसा है, जिस पर बर्फ नहीं ठहरती।

पर्वत के शेष भाग पर फैली बर्फ के मध्य वह हिस्सा कुछ ऐसा नजर आता है, जैसे भगवान शिव के कंठ पर व्याप्त नीला रंग हो। भगवान शिव के नीले कंठ के संदर्भ में प्रचलित कथा शायद तुम्हें न पता हो। आओ, हम तुम्हें बताते हैं।

पौराणिक काल में देवताओं और राक्षसों ने मिल कर समुद्र मंथन किया। मंथन से समुद्र के अंदर से बहुमूल्य चीजों के साथ अमृत भी निकला था। मंथन से समुद्र के अंदर से विष निकला, जिससे चारों तरफ हाहाकार मच गया। देवता-राक्षस सभी परेशान हो गए कि इससे मुक्ति कैसे मिले।

विश्व को इस विष से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान शिव ने विष पी लिया। उन्होंने अपनी यौगिक शक्तियों के आधार पर उसे अपने कंठ में ही रोक लिया। इसके फलस्वरूप उनका कंठ नीला पड़ गया। तब से भगवान शंकर को नीलकंठ भी कहा जाता है। ऐसी ही छवि के कारण इस शिखर का नाम भी नीलकंठ पड़ गया।

« Last Edit: January 02, 2010, 04:21:07 AM by devbhoomi »
"जुगराज रैया या धरती और याखाका मनखी जय देवभूमि उत्तराखंड "

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समुद्र तल से 6,597 मीटर ऊंची नीलकंठ पीक एक पिरामिड के समान नजर आती है। इस पहाड़ी पर चढ़ना काफी कठिन है। यही कारण है कि पिछले 50 साल में इस पहाड़ी परबहुत कम अन्वेषण हुए हैं।

पता है, इस पीक पर फतह पाने के पहले 9 अन्वेषण असफल रहे थे। पहला प्रयास 1937 में फ्रैंक स्मिथ द्वारा किया गया था। उनका अभियान असफल रहा, लेकिन वह नीलकंठ के सौन्दर्य से इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने इसे हिमालय की दूसरी सुंदरतम पहाड़ी कहा था। पहली बार जून 1974 में इस पर फतह पायी गयी।

 भारतीय तिब्बत सीमा पुलिस के सोनम पुल्जर, कन्हैया लाल, दिलीप सिंह तथा नीमा दोरजी उत्तरी दिशा से नीलकंठ शिखर तक पहुंचे थे। उस अभियान का नेतृत्व एसपी चमोली द्वारा किया गया था। उसके उपरांत दूसरा सफल अभियान 1993 में संभव हुआ।

जून 2000 में ब्रिटेन के मार्टिन मोरेन ने पश्चिमी रिज से पहली बार नीलकंठ शिखर को स्पर्श किया। उन्होंने आखिर के दो सौ मीटर की चढ़ाई रस्से की सहायता से की थी। 2001 और 2007 में भी इस शिखर पर सफल अभियान हुए। 2007 के अभियान में कुल 11 पर्वतारोही शिखर तक पहुंचने में सफल हुए। इस अन्वेषण का नेतृत्व अपूर्व कुमार भट्टाचार्य द्वारा किया गया था।
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नीलकंठ शिखर के आसपास प्रकृति की अनोखी छटा है। इसके उत्तर-पश्चिम में सतोपंथ ग्लेशियर, दक्षिण-पश्चिम में पनपटिया ग्लेशियर तथा पश्चिम दिशा में विशाल गंगोत्री ग्लेशियर एवं अन्य हिम शिखर हैं। इसके निकट ही गौरी पर्वत एवं हाथी पर्वत नामक शिखर स्थित हैं।

 नीलकंठ को देखना हो तो तुम बद्रीनाथ जा सकते हो। वहां से इसका सुंदरतम रूप नजर आता है। जानते हो कुछ लोग इसके सौन्दर्य को करीब से देखने के लिए इसके बेस कैम्प तक ट्रैकिंग करते हुए पहुंचते हैं।

 इसके लिए बद्रीनाथ से चरण पादुका होकर करीब 10 कि.मी. पैदल चलना पड़ता है। यह बेस कैम्प 4,270 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह रास्ता किसी अनुभवी गाइड की मदद से तय करना पड़ता है।

नीलकंठ शिखर बद्रीनाथ मंदिर की पृष्ठभूमि में दिखाई पड़ता है। सुबह के समय सूर्य की किरणें सबसे पहले इस शिखर पर पड़ती हैं। उस समय शिखर की दुग्ध धवल छवि वास्तव में अपूर्व लगती है।

 दिन में सूर्य की दिशा बदलने के साथ इसकी छवि भी कई रूप बदलती है। यह जान कर तुम्हें आश्चर्य होगा कि इतने मनोहारी स्वरूप के कारण नीलकंठ पीक को ‘गढ़वाल क्वीन’ भी कहते हैं। जानते हो गढ़वाल की प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन करते समय इस हिम शिखर का वर्णन अवश्य किया जाता है।


« Last Edit: January 02, 2010, 04:02:20 AM by devbhoomi »
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यह  गढ़वाल  हिमालय  में सबसे  सुंदर  चोटियों  में से  एक है।  यह बद्रीनाथ  के काफी  पास हैं।  बहरहाल, पर्वतारोहियों  के लिए  कठिन परिस्थितियों  जैसे लंबी, शिखरिका  पर्वतश्रेणियों  और हिमस्खलन  संभाव्य  अग्रभागों  का अर्थ  है कि  नीलकंठ  की चढ़ाई  केवल दो  ही बार  हो पाई  है।

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नीलकंठ पर्वत श्रृंखला के बारे में,भारतीय भू-गर्भ सर्वेक्षण विभाग ने बदरीनाथ के पीछे स्थित नीलकंठ पर्वत के शीर्ष पर दरार की पुष्टि की है। लेकिन विभाग

ने हिंदुओं के इस जाने-माने तीर्थस्थल को खतरे से बाहर बताया है। भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण विभाग के डायरेक्टर डॉ. पी. सी. नवानी ने बताया कि हमारे विशेषज्ञों ने बदरीनाथ मंदिर को गोद में धारण करने वाले नीलकंठ पर्वत का अध्ययन कर इसकी रिपोर्ट राज्य सरकार को भेज दी है।

उन्होंने बताया कि नीलकंठ पर्वत पर दरार जरूर आ गई है, मगर बदरीनाथ तीर्थ पूरी तरह सुरक्षित है। विभाग ने स्थल निरीक्षण के अलावा सैटलाइट तस्वीरों के जरिए नीलकंठ का अध्ययन किया है, जिसमें इस पर्वत के शीर्ष पर दरार की पुष्टि हो गई है। उन्होंने बताया कि भारतीय दूर संवेदन संस्थान द्वारा इस क्षेत्र के 5 साल पुराने सैटलाइट चित्र भी उपलब्ध कराए गए। उन चित्रों में भी यह दरार मौजूद थी।

 उन्होंने बताया कि उच्च हिमालयी क्षेत्र में इस तरह की हलचलें सामान्य है। प्राय: बर्फ पिघलकर चट्टानों के जोड़ों में पहुंच जाती है जिससे शिलाखंड गतिमान हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि इस दरार को मापने की कोशिश की गई, मगर मौसम की खराबी के कारण हेलिकॉप्टर से वहां गए भूवैज्ञानिकों को सफलता नहीं मिली।
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डॉ. नवानी ने बताया कि अगर इस दरार के कारण नीलकंठ पर्वत पर भूस्खलन भी हुआ तो भी बदरीनाथ मंदिर सुरक्षित रहेगा, क्योंकि इस स्थान से मंदिर की दूरी लगभग 8 किलोमीटर है। उन्होंने बताया कि मंदिर के लिए खतरे के आशंका को देखते हुए राज्य सरकार ने विभाग की मदद मांगी थी, जो दे दी गई।

इधर चिपको आंदोलन से जुड़े भूवैज्ञानिक एवं समाजसेवी महेंद्र सिंह कुंवर ने भी डॉ. नवानी के तर्क से सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि जिस चट्टान पर बदरीनाथ स्थित है, उसका नीलकंठ वाली चट्टान से सीधा संबंध नहीं है। इसलिए नीलकंठ के शीर्ष की दरार से बर्फ का पिघला हुआ पानी बदरीनाथ को खतरा पैदा नहीं कर सकता।




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उत्तराखंड के नीलकंठ पर्वत पर स्‍वयं भगवान शिव विराजते हैं. ऐसी मान्‍यता है कि यहां पर महादेव आज भी तपस्‍यालीन है. भोलेनाथ के दर्शन करने के लिए भक्‍त हजारों फीट की चढ़ाई कर स्‍वयं को धन्‍य मानते हैं.



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उत्तराखंड के नीलकंठ पर्वत पर स्‍वयं भगवान शिव विराजते हैं. ऐसी मान्‍यता है कि यहां पर महादेव आज भी तपस्‍यालीन है. भोलेनाथ के दर्शन करने के लिए भक्‍त हजारों फीट की चढ़ाई कर स्‍वयं को धन्‍य मानते हैं.

  http://aajtak.intoday.in/index.php?option=com_magazine&opt=section&sectionid=1&secid=2&Itemid=1&videoid=6489&play_video=0
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भारतीय संस्कृति की विशाल छटा को अपनी संपूर्ण सुषमा के साथ यदि देखना हो तो आइए, चलें हिमालय की गोद में दस हजार तीन सौ पांच फुट की उंचाई पर अवस्थित बदरीनाथ धाम।

 बदरीनाथ जहां राष्ट्र की उत्तरी सीमा पर खड़े होकर भारतीय संस्कृति की विशालता और भव्यता का संदेश देता है वहां वह भारतीयों के मन में तप और पावनता की सनातन संवेदना भी जागृत करता है। सारे भातर से हजारों वर्षो से यात्री यहां आकर हिमालय के दिव्य सौंदर्य का पान करते-करते कण-कण में विद्यमान प्रभुता का अहसास किये बिना नहीं रह सकते।

हजारों नदियां, नालों और पहाड़ों की दुर्गम घाटियों को पार करते हुये जब यात्री देवदर्शिनी से बदरीविशाल की एक झलक पा लेता है तो उसका सारा परिश्रम, सारी थकावट एक क्षण में आह्लाद में बदल जाते हैं। यात्री धन्य हो जाता है। हजारों वर्षो से भारतीय आस्था और विश्वास का यह अनोखा केद्र काल और समय को जीतकर प्रसन्नता की हंसी बिखेर रहा है।

बदरीनाथ की यात्रा जेठ महीने की अक्षय तृतीया के आसपास शुरु होती है और कार्तिक-मार्गशीर्ष में संपूर्ण हो जाती है। छह महीनों तक तपोभूमि मानवों की चहल-पहल से मुखर रहती है और शेष छह महीनों तक अपने आप में स्थित हो जाती है। सारी देवभूमि परम शांति की बर्फानी चादर ओढ़कर बिल्कुल नि:शब्द मौन में डूब जाती है। देवों की यह भूमि देवों की हो जाती है।
बदरीनाथ की यात्रा बहुत कठिन मानी जाती है। पहले यात्री घर-गृहस्थी से विदा लेकर पहाडों की ओर देवभूमि के दर्शन के लिए बड़ी श्रद्धा और विश्वास के साथ चल पड़ता था।

महीनों यों ही बीत जाते थे। घर वापस आ गये तो अच्छा है अन्यथा यही भूमि उन्हें अपने में समा लेती थी। यह भी एक पुण्यावस्था मानी जाती थी। यहां देवता निवास करते हैं इसलिए देवभूमि है और यहां आना एक तपस्या ही है इसलिए तपोभूमि है।

 आधुनिक काल में महर्षि दयानंद सरस्वती और स्वामी विवेकानन्द अपनी तप: साधना के लिए यहां आए थे। तप के लिए ऐसा सुंदर वातावरण अन्यत्र मिलना कठिन है।


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Way to badrinath and neelkanth

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चंपावत के कत्यूरी राजा झलराई की यूं तो सात रानियां थीं, लेकिन संतान एक भी नहीं थी। ज्योतिषियों ने राजा को आठवें विवाह की सलाह दी। अर्द्धरात्रि में राजा को स्वप्न हुआ कि नीलकंठ पर्वत पर कलिंका नामक सुंदरी उनकी प्रतीक्षा कर रही है। राजा लाव-लश्कर के साथ नीलकंठ पहुंचे। कलिंका के साथ वहां उनका विधिवत विवाह हो गया।

 कलिंका गर्भवती हुई। सातों रानियों ने ईर्ष्यावश एक षड्यंत्र के तहत प्रसव कै समय कलिंका की आंखों पर पट्‌टी बांध दी और जब शिशु उत्पन्न हुआ, तो शिशु के स्थान पर सिल-बट्‌टा रखकर यह प्रचारित कर दिया गया कि कलिंका ने सिल-बट्‌टे को जन्म दिया है। शिशु को मारने के लिए रानियों ने पहले उसे हिलीचुली नामक खतरनाक गायों के आगे डाल दिया, लेकिन जब एक गाय उसे दूध पिलाने लगी, तब उन्होंने उसे बिच्छू घास के ढेर पर फेंक दिया। जब वहां भी उसे कुछ नहीं हुआ, तो उसे नमक के ढेर पर रख दिया, लेकिन नमक जैसे शक्कर में बदल गया।

अब रानियों ने उसे नमक से भरे संदूक में रख काली नदी में बहा दिया। सात दिन और सात रातें बीतने के बाद वह संदूक गोरीघाट में भाना नामक मछुवारे को मिला। मछुआरे पति-पत्नी ने बालक का नाम गोलू रखा और उसका पालन-पोषण किया।
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