Author Topic: Pithoragarh: Kashmir Of Uttarakhand - पिथौरागढ़: उत्तराखण्ड का कश्मीर  (Read 7520 times)

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Online पंकज सिंह महर

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पिथौरागढ़

पिथौरागढ़ का पुराना नाम सोरघाटी है। सोर शब्द का अर्थ होता है-- सरोबर। यहाँपर माना जाता है कि पहले इस घाटी में सात सरोवर थे। दिन-प्रतिदिन सरोवरों का पानी सूखता चला गया और यहाँपर पठारी भूमि का जन्म हुआ। पठारी भूमी होने के कारण इसका नाम पििथौरा गढ़ पड़ा। पर अधिकांश लोगों का मानना है कि यहाँ राय पिथौरा की राजधानी थी। उन्हीं के नाम से इस जगह का नाम पिथौरागढ़ पड़ा। राय पिथौरा ने नेपाल से कई बार टक्कर ली थी। यही राजा पृथ्वीशाह के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

पिथौरागढ़ अल्मोड़ा जनपद की एक तहसील थी। इसी एक तहसील से २४ फरवरी १९६० को पिथौरागढ़ जिला का जन्म हुआ। तथा इस सीमान्त जिला पिथौरागढ़ को सुचारु रुप से चलाने के लिए चार तहसीलों (पिथौरागढ़ डीडी घाट, धारचूला और मुन्शयारी) का निर्माण १ अप्रैल १९६० को हुआ।

इस जगह की महत्ता दिन-प्रतिदिन बढ़ती चली गयी। शासन ने प्रशासन को सुदृढ़ करने हेतु १३ मई १९७२ को अल्मोड़ जिले से चप्पावत तहसील को निकालकर पिथौरागढ़ में मिला दिया। चम्पावत तहसील कुमाऊँ की संस्कृति का प्रतिनिधित्व करनेवाला क्षेत्र है। कत्यूरी एवं चन्द राजाओं का यह काली कुमाऊँ-तम्पावत वाला क्षेत्र विशेष महत्व रखता है। आठवीं शताबादी से अठारहवीं शताब्दी तक चम्पावत कुमाऊँ के राजाओं की राजधानी रहा है।

इस समय पिथौरागढ़ में डीडी हाट, धारचूला, मुनस्यारी, चम्पावत और पिथौरागढ़ नामक पाँच तहसीले हैं। इन पाँच तहसीलों में पिथौरागढ़ में पिथौरागढ़, डीडी हाट, कनालीछीना, धारचूला, गंगोलाहाट, मुनस्यारी, बेरीनाग, मुनाकोट, लोहाघाट, चम्पावत, पाटी, बाराकोट नामक बारह विकासखंड हैं जिनमें ८७ न्यायपंचायते, ८०८ ग्रमसभायें और कुल छोटे-बड़े २३२४ गाँव हैं।
« Last Edit: September 05, 2009, 10:43:31 AM by हिमांशु पाठक »
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पिथौरागढ़ के धारचूला, डीडी हाट, तम्पावत तहसीलों के बीहड़ इलाकों में 'राजि वन रावत' नामक जनजाती भी निवास करती है। इनके कुल सात गाँव हैं जिनमें केवल ९२ घरें हैं। 'राजि वन रावतों' की जनसंख्या १९८१ की जनगणना कुल ३७१ हैं, जिनमें पुरुषों की संख्या २०५ और महि#लिाओं की संख्या १६६ को गिनती किया गया है।

पिथौरागढ़ में 'भोटिया अर्थात शौका' भी दूसरी अनुसूचित जनजाती है। यह अनुसूचित जिजाति धारचूला और मुनस्यारी तहसील के अन्तर्गत निवास करती है। धारचूला तहसील में शौका अर्थात भोटिया जनजाति दारमा (धौली नदी की उपत्यका) व्यास (काली नदी की उपत्यका) और चौदास में निवास करती है। मुनस्यारु तहसील में शौका क्षेत्र जौहार के उत्तर में, तिब्बत से पश्चिम में चमोली (गढ़वाल) से दक्षिण में और डीडी हाट से पूर्व में पंचमूली की श्रेणियाँ दारमा से निली हुई है। मल्ला जोहार और गोरीफाट के १५ गाँव शौका जनजाति के गाँव हैं। इस क्षेत्र का अन्तिम और सबसे बड़ा गाँव मिलम है, मिलम ग्लेशि यर को नाम देने का श्रेय इसी गाँव को है। गोरी गंगा का उद्गम इसी ग्लेशियर से हुआ है।

पिथौरागढ़ की चौहदी इस प्रकार है -- पूर्व में नेपाल, पश्चिम में अल्मोड़ा, और चमोली (गढ़वाल), दक्षिण में नैनीताल और उत्तर में तिब्बत स्थित है। इस जनपद का कुल क्षेत्रफल ८८,५५९ वर्ग किमी. है।

पिथौरागढ़ सुन्दर - सुन्दर घाटियों का जनपद है। नदी घाटियों का जनपद है। नदी घाटियों में यहाँ प्राकृतिक सौन्दर्य बिखरा हुआ है। सीढ़ीनुमा खेतों की सुन्दरता पर्यटकों का मन मोह लेती है। यहाँ के पर्वतों की अनोखी अदा सैलानियों को मुग्ध कर देती है। नदियों का कल-कलस्वर प्रकृति प्रेमियों को अलौकिक आनन्द देता है।
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पिथौरागढ़ - यह समुद्रतल से १६१५ मीटर की उँचाई पर ६.४७ वर्ग किलोमीटर की परिधि में बसा हुआ है। इस नगर का महत्व चन्द राजाओं के समय से रहा है। यह नगर सुन्दर घाटी के बीच बसा है। कुमाऊँ पर होनेवाले आक्रमणों को पिथौरागढ़ ने सुदृढ़ किले की तरह झेला है। जिस घाटी में पिथौरागढ़ स्थित है, उसकी लम्बाई ८ किमी. और चौड़ाई १५ किमी. है। रमणीय घाटी का मनोहर नगर पिथौरागढ़ सैलानियों का स्वर्ग है।

पिथौरागढ़ पहुँचने के लिए दो मार्ग मुख्य हैं। एक मार्ग टनकपुर से और दूसरा काठगोदाम हल्द्वानी से है। पिथौरागढ़ का हवाई अड्डा पन्तनगर अल्मोड़ा के मार्ग से २४९ किमी. का दूरी पर है। समीप का रेलवे स्टेशन टनकपुर १५१ किमी. की दूरी पर है। काठगोदाम का रेलवे स्टेशन पिथौरागढ़ से २१२ किमी. का दूरी पर है।

पिथौरागढ़ नगर में पर्यटकों के रहने-खाने के लिए पर्याप्त व्यवस्था है। यहाँ २४ शैयाओं का एक आवासगृह है। सा. नि. विभाग, वन विभाग और जिला परिषद का विश्रामगृह है। इसके अलावा यहाँ आनन्द होटल, धामी होटल, सम्राट होटल, होटल ज्योति, ज्येतिर्मयी होटल, लक्ष्मी होटल, जीत होटल, कार्की होटल, अलंकार होटल, राजा होटल, त्रिशुल होटल आदि कुछ ऐसे होटल हैं जहाँ सैलानियों के लिए हर प्रकार की सुविधाऐं प्रदान करवाई जाती है।

पर्यटकों के लिए 'कुमाऊँ मंडल विकास निगम' की ओर से व्यवस्था की जाती है। शरद् काल में यहाँ एक 'शरद कालीन उत्सव' मनाया जाता है। इस उत्सव मेले में पिथौरागढ़ की सांस्कृतिक झाँकी दिखाई जाती है। सुन्दर-सुन्दर नृत्यों का आयोजन किया जाता है।

पिथौरागढ़ में स्थानीय उद्योग की वस्तुओं का विक्रय भी होता है। राजकीय सीमान्त उद्योग के द्वारा कई वस्तुओं का निर्माण होता है। यहाँ के जूते, ऊन के वस्र और किंरगाल से बनी हुई वस्तुओं की अच्छी मांग है। सैलानी यहाँ से इन वस्तुओं को खरीदकर ले जाते हैं।

पिथौरागढ़ में सिनेमा हॉल के अलावा स्टेडियम औरनेहरु युवा केन्द्र भी है। मनोरंजन के कई साधन हैं। पिकनिक स्थल हैं। यहाँ जर्यटक जाकर प्रकृति का आनन्द लेते हैं।

पिथौरागढ़ में हनुमानगढ़ी का विशेष महत्व है। यह नगर से २ किमी. की दूरी पर स्थित है। यहाँ नित्यप्रति भक्तों की भीड़ लगी रहती है।

एक किलोमीटर की दूरी पर उलवा देवी का प्रसिद्ध मन्दिर है। लगभग एक किलोमीटर पर राधा-कृष्ण मन्दिर भी दर्शनार्थियों का मुख्य आकर्षण है। इसी तरह एक किलो मीटर पर राय गुफा और एक ही किलोमीटर की दूरी पर भटकोट का महत्वपूर्ण स्थान है।


पिथौरागढ़ सीमान्त जनपद है। इसलिए यहाँ के कुछ क्षेत्रों में जाने हेतु परमिट की आवलश्यकता होती है। पिथौरागढ़ के जिलाधिकारी से परमिट प्राप्त कर लेने के बाद ही सीमान्त क्षेत्रों में प्रवेश किया जा सकता है। पर्यटक परमिट प्राप्त कर ही निषेध क्षेत्रों में प्रवेश कर सकते हैं। चम्पावत तहसील के सभी क्षेत्रों में और पिथौरागढ़ के समीप वाले महत्वपूर्ण स्थलों में परमिट की आवश्यकता नहीं होती।

 
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पिथौरागढ़ जनपद के कुछ महत्वपूर्ण स्थल कुछ इस प्रकार हैं।

१.  चण्डाक -

पिथौरागढ़ से केवल ७ किलोमीटर दूर समुद्रतल से १८०० मीटर की ऊँचाई पर चण्डाक नामक रमणीय स्थल स्थित है। पर्यटक चण्डाक जाकर पिकनिक करते हैं। यहाँ की प्राकृतिक छटा अत्यन्त आकर्षक है। चण्डाक से सम्पूर्ण घाटी बहुत साफ और आकर्षक दिखाई देती है। पर्यटक सम्पूर्ण घाटी के अद्भुत् सौन्दर्य को देखने हेतु चण्डाक अवश्य आते हैं। आजकल यहाँ मैग्नासाइट के उद्योग लग जाने से इस स्थान का महत्व और भी बढ़ गया है। औद्योगिक नगर के रुप में अब इस स्थान की प्रगति हो रही है।

थल केदार -

 थल केदार में शिव का मन्दिर है। पिथौरागढ़ से इसकी दूरी ६ कि. मि. है। यह अत्यन्त सुषमापूर्ण स्थान है। शिवरात्री के दिन यहाँ पर एक विशाल मेला लगता है। दूर-दूर के यात्री इस अवसर पर यहाँ आते हैं। पिथौरागढ़ में थल मेला का भी विशेष महत्व है। मेले के अवसर पर यहाँ पर नृत्यों का आयोजन भी होता है। अन्य आकर्षक कार्यक्रम भी सम्पन्न किए जाते हैं।

ध्वज -

'ध्वज' पिथौरागढ़ का ध्वज है। यह अत्यन्त सौन्दर्य वाला स्थल है। यहाँ से हिमालय का दृश्य इतना आकर्षक है कि पर्यटन एवं प्रकृति-प्रेमी केवल यहाँ से हिमालय के अद्भुत सुषमा के दर्शन हेतु दूर-दूर से आते है। हिमालय का हिमरुपी चाँदी का-सा भव्य सुकुट दर्शकों को आपार शान्ति देता है। पिथौरागढ़ धारचूला मोटर मार्ग के १८ वें किलोमीटर पर समुद्रतल से २,१०० मीटर की ऊँचाई पर 'ध्वज' स्थित है। प्रकृति के अत्यन्त लुभावने स्थलों में ध्वज की गिनती की जाती है।


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श्री कैलाश नारायण आश्रम -

 यह आश्रम भारत विख्यात हो चुका है। स्वामी श्री १०८ नारायण स्वामी ने इसकी स्थापना १९३६ में की थी, उन्हीं के नाम से यह आश्रम प्रसिद्ध हो गया है।

चौबासपट्टी के सोसा गाँव से ४२-४२ किमी. पूरब की ओर २७०० मीटर की ऊँचाई पर यह आक्श्रम स्थित है। यह अत्यन्त रमणीय स्थल है, यहाँ पर स्वामी जी ने एक भव्य मंदिर बनवाया है। कई भवन बनवाये हैं। उद्यान और फूलों के बगीचे भी लगवाये। इस स्थान की सुन्दरता इतनी अधिक है कि देश के कोने-कोने के प्रकृति प्रेमी इस आश्रम में रहकर हिमालय के अद्भुत दर्शन करते हैं।

इस आश्रम से कैलाश मानसरोवर जाने के लिए मार्ग है। चीन की सीमा यहाँ से अतिनिकट है। विश्व प्रसिद्ध भूगोलवेता स्वामी प्रणवानन्द इसी आश्रम में रहते हैं और यहीं से वे कई बार कैलास मानसरोवर की यात्रा कर चुके हैं।


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कुटी -

धारचूला तहसील का कुटी आखरी गाँव है, ५,४४५ मीटर की ऊँचाई पर यह गाँव स्थित है। यह स्थान अपनी प्राकृतिक सुन्दरता के लिए विख्यात है। पिथौरागढ़ की लोककथाओं में इस स्थान को कैलास धाम माना गया है।

यह स्थान किसी शौका सामन्त राजा की राजधानी भी रहा है। यहाँ आज भी खसकोट के खण्डहर हैं, जिससे ज्ञात होता है कि यहाँ पहले किसी न किसी प्रभावशाली राजा का किला रहा होगा। कुटी में एक अद्भुत पत्थर है, जिसके बीच में एक १.५ फीट व्यास का विवर (छेद) है, लोगों का यह मानना है कि जो व्यक्ति इस छेद को पार कर जाए वही धर्मात्मा है। जो पार न कर सके उसे पापी व अधर्मी समझा जाता है। ग्लेशियर के द्वारा निर्मित समतल पठार पर बसा हुआ कुटी गाँव सम्पूर्ण पिथौरागढ़ का आकर्षण क्षेत्र है। इसके चारों ओर हिमाच्छादित पहाड़ दिखाई पड़ता है।


३.  ज्योलिकलम -

यह एक रमणीक स्थान है, जो कुटी गाँव की सीमा पर स्थित है। शौका लोगों में यह मान्यता है कि यह स्थान कैलास मानसरोवर जैसा है, इस स्थान से हिमालय का दृश्य अत्यन्त आकर्षक दिखाई देता है।

 ४.  लिथलाकोट (तिलथिन)   

पिथौरागढ़ की चौंदास पट्टी के आबाद स्थानों में लिथलाकोट सबसे ऊँचे स्थानों पर स्थित है। चौंदास क्षेत्र के इष्टदेव 'स्यंसै' इसी लिथलाकोट की चोटी पर पूजे जाते हैं। इस चोटी के एक ओर मंदिर है। शौका लोगों का मानना है कि उनके पूर्वजों का निवास स्थान यहीं था। लिथलाकोट चोटी के चारों तरफ नीचे ढ़लानों पर चौदास के सारे गाँव बसे हैं।

पहाड़ के पीछे एक प्राचीन राजमहल के खण्डहर आज भी दिखाई देते हैं। यह स्थान अपनी सुन्दरता के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के रंग-बिरंगे फूल, मखमली घास और बाँस और देवदार के वृक्ष इतने सुन्दर हैं कि देश-विदेश के सैकड़ों पर्यटक यहाँ की सुन्दरता देखने लिथलाकोट पहुँचते हैं।


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५.  पंचचूली -

पंचचूली पर्वत शिखर दारमा धाटी में स्थित है। पंचचूली पर्वत क्श्रेण की यह विशेषता है कि मुक्य चोटी के चारों ओर चार अन्य पर्वत शिखर हैं। धार्मिक ग्रन्थों में इसे पंचशिरा कहते हैं। कुछ ग्रमीण लोगों की यह मान्यता है कि पाँचों पर्वत शिखर युधिष्ठिर, अर्जुन, भीम, नकुल और सहदेव-पाँचों पांडवों के प्रतीक हैं। इस खिखरों की विशेषता यह है कि प्रतिवर्ष देश व विदेश के पर्वतारोही इन शिखरों पर पर्वतारोहण के लिए आते हैं। परन्तु तेज ढ़ाल (सीधी ढ़ाल) के कारण कोई भी पर्वतारोही दल पंचचोली पर आज तक नहीं चढ़ पाया है।

शौका लोगों का यह पर्वत बहुत चहेता है, इसलिए इनके लोकगीतों में इसे दरमान्योली के नाम से पुकारा जाता है। पंचचूली के पाँच प्रदेश में एक ग्लेशियर भी है।

६.  मनेला ग्लेशियर से बना हुआ आकर्षक और मनोहरी मैदान है, यहीं पर काली और कुटी नदियों का संगम होता है। यह अत्यन्त प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों में माना जाता है। मैदान के किनारे पहाड़ की जड़ पर व्यास मुनी का मंदिर है। इस मंदिर के ऊपर एक महादेव का प्रसिद्ध मंदिर है। व्यास घाटी व्यास मुनि के नाम से जानी जाती है। सम्पूर्ण शौका जनजाति महर्षि वेदव्यास को अपना पूर्वज मानती है। इस क्षेत्र में वेदव्यास की पूजा होती है।

मनेला में महर्षि व्यास जी के मंदिर के समक्ष रक्षावंधन के पुनीत पर्व पर दो दिन का मेला लगता है। मेला शुरु होने से पहले रात्रि - जागरण, कीर्तन, भजन, खेलकूद और लोकनृत्य गीतों का आयोजन शुरु हो जाता है। पूर्णमासी के दिन मुख्य मेला लगता है, दूर-दूर के लोग मेले में आते हैं, व्यास क्षेत्र का यह तो प्रमुख मेला है, जिसमें प्रत्येक व्यास भक्त उपस्थित होना अपना सौभाग्य समझता है।

व्यास के मंदिर से कुछ ही दूरी पर कैलाशपति शिव का मंदिर है, यहाँ भी निरन्तर पूजा होती है। शिवपूजा शिवरात्री पर विशेष ढ़ंग से की जाती है।

यहाँ की एक विशेषता और है, व्यासमंदिर के १५० गज की दूरी पर पश्चिम-उत्तर की दिशा में एक छीटी सी गुफा है, जिसमें ९ साँप एक ही साथ रहते हैं। ये सफेद, काले और सफेद-काले मिश्रित रंग के हैं। ये धूप सेंकने के लिए एक साथ बाहर आते हैं, यहाँ के लोग इन्हें दूध पिलाकर शिव के गण के रुप में पूजते हैं। ये कभी किसी का नुकसान नहीं करते बल्कि मनौती करनेवाले लोगों को बाहर निकलकर आशीर्वाद देते हैं। यहाँ सामूहिक पूजा होती है। इस मेले में व्यासपट्टी के आकर्षण लोकनृत्यों का प्रदर्शन होता है, जिन नृत्यों तो देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं।[/
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७.  जौलजीवी -

काली और गोरी नदी के संगम पर शौकाओं के शीतकालीन आवास-क्षेत्र के दक्षिणी भाग में स्थित है। यहाँ पर समस्त कुमाऊँ का सबसे बड़ा औद्योगिक मेला लगता है। ज्वाहर जयन्ती (१४ नवम्बर) से १५ दिन तक इस मेले का आयोजन होता है। यह पिथौरागढ़ , से ६८ कि. मि. की दूरी पर स्थित है।

इस मेले में शौका, कुमाऊँनी, नेपाली और मैदानी क्षेत्र के हजारों व्यापारी आते हैं और अपने-अपने ढ़ंग का व्यापार करते हैं।

तिब्बत व्यापार - संधि के समाप्त होने से पहले जौलजीवी का मेला शौका व्यापारियों द्वारा आयोजित ऊन तथा ऊनी माल के लिए विख्यात था। नेपाल से अब भी इस मेले में घी, शहद और घोड़े लाये जाते हैं।

इस मेले में जहाँ औद्योगिक सामाग्री की प्रदर्शनी लगती है - वहाँ विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक कार्यक्रम भी सम्पन्न किये जाते हैं। नेपाली, शौका एवं कुमाऊँनी नृत्यगीतों के लिए यह मेला विशेष रुप से प्रसिद्ध है।


८.  छियालेख -

यह स्थल अपनी बनावट और प्राकृतिक सुन्दरता के लिए विख्यात है। इसके चारों ओर भारत तता नेपाल की हिमाच्छादित पर्वत - श्रेणियाँ हैं। यह स्थल ऊँची पर्वत - श्रेणी के ऊपर एक समतल पठार है। मैदान में नाना प्रकार के फूल खिले रहते हैं। शंकु आकार के सुन्दर-सुन्दर वृक्षों का छाया में उस स्थल की सुन्दरता और बढ़ जाती है। वर्म देवता और छेतो माटी देवताओं के मन्दिर यहीं स्थित है। इन्हीं देवताओं के कारण 'छियालेख' का धार्मिक महत्व भी है। इस क्षेत्र में एक किम्वदन्ति प्रसिद्ध है कि एक बार राम, लक्ष्मण और सीता इस स्थल पर पहुँचे थे। लोगों का यह भी मानना है कि कल्पवृक्ष यहीं था। युगों युगों से चले आये संस्कारों के कारण इस स्थल की मान्यता सम्पूर्ण क्षेत्र में है।

शौका क्षेत्र अत्यन्त सुन्दर है। यहाँ अनेक ऐसे स्थल हैं जिनका धार्मिक, प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक महत्व है। ऐसे अनेक दर्शनीय स्थलों को देशने दूर-दूर से लोग आते हैं। इस अंचल के 'छिपला केदार', 'बंबास्यांसै', 'गबला स्यांसै', 'ज्योलिंका कैलास मेला' और 'वेदव्यास मेला' अपने ढ़ंग के ऐसे मेले हैं जिनका अपना ऐतिहासिक महत्व है। इन मेलों में शौका लोग बड़े उत्साह से जाते है। जौलजीवी का मेला उद्योग तथा मनोरंजन का मेला है, जबकि उपरोक्त अन्य मेले पूर्णतः धार्मिक मेले हैं।

पिथौलागढ़ के शौका क्षेत्र की अपनी विशिष्टता है। यह क्षेत्र युगों - युगों से व्यापार का केन्द्र रहा है। इस क्षेत्र के शौका व्यापारी पश्चिमी तिब्बत के दुश्यर गरलोक, ज्ञानिमा, दर्चयन और ताकलाकोट आदि स्थानों पर जाकर व्यापार करते थे।

आज शौका क्षेत्र के कई उदीयमान युवक देश की हर सेवा में आगे आ रहे हैं। शौका क्षेत्र में दंतो चकहिया नामक शक्तिशाली शासक को याद किया जाता है। सुनपति शौका तो कुमाऊँ के लोकगीतों के नायक ही हैं। सुनपति शौका की ही पुत्री राजुला 'मालूसाही' की प्रसिद्ध नायिका थी। इसी तरह कन्ती - फौंदार की यशस्वी गाथा भी इस क्षेत्र की एक विशेषता है। दानवीर जसुली बूढ़ी शोक्याणी का नाम भी पूरे शौका में प्रसिद्ध है। इसी तरह पं. गोबरया, श्री परमल सिंह धाकी, श्री मोती सिंह मेम्बर, श्री त्यिका नगन्याल, श्री जबाहर सिंह व्यास आदि का नाम इस क्षेत्र में बड़े आदर के साथ लिया जाता है। इन लोगों ने अपने क्षेत्र और क्षेत्र की संस्कृति के उत्थान के लिए बहुत प्रशंसनीय कार्य किए हैं।
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Om Parvat

(also Adi Kailash, Little Kailash, Jonglingkong Peak, Baba Kailash, Chhota Kailash) is an ancient holy Hindu mountain in the Himalayan mountain range, lying in the Pithoragarh district of Uttarakhand, India, near Sinla pass. Its appearance is distinctly similar to Mount Kailash in Tibet . In addition, its snow deposition pattern gives the impression of the Hindu sacred syllable 'AUM' (ॐ) written on it. Near Om Parvat lie beautiful Parvati Lake and Jonglingkong Lake. Jonglingkong Lake is sacred, like Mansarovar, to the Hindus. Opposite to this peak is a mountain called Parwati Muhar, whose snow shines like a crown in the sun.

This peak was attempted for the first time by an Indo-British team including Martin Moran, T. Rankin, M. Singh, S. Ward, A. Williams and R. Ausden. The climbers promised not to ascend the final 10 m (30 ft) out of respect for the peak's holy status. However, they were stopped around 200 m (660 ft) short of the summit by very loose snow and rock conditions.

The first ascent of Adi Kailash came on October 8, 2004. The team comprised Tim Woodward, Jack Pearse, Andy Perkins (UK); Jason Hubert, Martin Welch, Diarmid Hearns, Amanda George (Scotland); and Paul Zuchowski (USA). They did not ascent the final few metres, again out of respect for the sacred nature of the summit.

Om Parvat can be viewed enroute to the Kailash Manasarovar Yatra from the last camp below Lipu Lekh pass at Nabhidhang. Many trekkers to Adi Kailash often make a diversion to view Om Parvat.



 
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Online हेम पन्त

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Pankaj da itni saari Information dene ke liye dhanyavaad.........Mujhe aaj kai nai cheeje pata chali hain Pithoragarh ke baare mein.......
मैंने न कभी देखा तुमको, पर प्राण तुम्हारी वह छाया- जो रहती है मेरे उर में, वह सुन्दर है पावन सुन्दर!  कविवर चन्द्र कुंवर बर्त्वाल

Online एम.एस. मेहता /M S Mehta

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Mahar Ji,

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"जय १००८ मूल मूलनारायण जी की जय हो" !!
 

Online पंकज सिंह महर

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Pankaj da itni saari Information dene ke liye dhanyavaad.........Mujhe aaj kai nai cheeje pata chali hain Pithoragarh ke baare mein.......


Mahar Ji,

Great information..


भाई लोगो,   धन्यवाद

सब भानुमति के पिटारे (इंटरनेट) की माया है.....
......
यो नै हुन, ऊ नै हुन! कै बेर, कै नै हुन|
सीर पाणी की वां फुटेली, जां मारुंला लाता|
लश्का कमर बांधा, हिम्मत का साथा.....!

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 From Wikipedia

Pithoragarh is a city and a municipal board in Pithoragarh district in the Indian state of Uttarakhand. It was carved out of district of almora in 1962.

History

Pithoragarh derives it's name from tradition of rajputs, to name the places they settled in, after the places they arrived from. Pithoragarh was the capital of Prithvi Raj Chauhan, also known as Rai Pithora. Chauhan settlers surviving muslim invaders named Pithoragarh, the present district in Uttarakhand.

Places of interest in Pithoragarh include Patal Bhuvaneshwar, Chandak, Dewalthal, Dharchula, Munsiyari and Kali Mandir of Gangolihat. Kumaon University College is the main educational institution in the district for higher studies.

Demographics

In 1841 Pilgrim (Barron), while passing through Pithoragarh, wrote : "... The first view of Pithoragarh is striking,in one instant, when you reach the top of the pass (Chandak) which overlooks it, a wide valley bursts on the view, with the small neat military cantonment, fort and scattecyan villages, and meandering streams, which distribute fertility to thousands of well cultivated fields.... I was apprehensive, too, that the beauties of Nainital had exhausted the store, and found that I was never in my life more mistaken."

After its conquest by the Rajwar of Ukko Bhartpal in the year 1364, Pithoragarh was for the whole of the remaining 14th century by the three generation of Pals and the kingdom extended from Pithoragarh to Askot. According to a tamrapatra dating back to 1420 the Pal dynasty was uprooted by the Brahm dynasty of Nepal but subsequently following the death of Gyan Chand in a conflict with Kshetra Pal, the Pal supremacy was restored. It is believed that Bhartichand, an ancestor of Gyan Chand, had replaced bums, the ruler of Pithoragarh, after defeating them in 1445. In the 16th century, the Chand dynasty again took control over Pithoragarh town and in 1790 built a new fort on the hill where the present Girls Inter College is situated. Subsequently after the British domination, Pithoragarh remained a Tehsil under Almora district until it was elevated as a district in the year 1960. To a tourist it will unfold its unique charms as a combination of the rural and the urban, the former scattered around in abundance. Pithoragarh is rich in minerals, magnesite and soap stone is find here in Dewalthal.

Pithoragarh, also gateway to the Himalaya's from the north, better known for the charming and painstaking journey taken by hundreds of pilgrims to kailash mansarovar. Pithoragarh is known for its simple people and simple life.

Pithoragarh also known as Soar Valley was once known for its cool water fountains. In fact, the name "Soar" has its meaning rooted to the word cool. Pithoragarh is primarily a valley surrounded by mountains, though the area is small and scattered but the area is now being gobbled up by concrete construction by people of nearby villages in the district. Pithoragarh has is one of the most scenic places in Uttarakhand lacks major tourist flow because of its distance from the plains that is the Bhabar and Tarai regions of Uttarakhand. pithoragarh has been often referred as mini kashmir by the peoples. however, this place was never got the recognition what it deserves due to ignorance from the state goverments in the past. now, the hope hase risen, because of the formation of new state
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District Pithoragarh : Profile

Pithoragarh  District  having  its entire northern and eastern boundaries being international, assumes a  great strategicsignificance and, obviously, is
a politically sensitive district along the northern frontier of  India. Being   the  last district adjoining Tibbet,  it has tremendous strategic importance as    the passes of Lipulekh, Kungribingri, Lampia Dhura, Lawe  Dhura, Belcha  and  Keo,  open out  to  Tibbet.  The breath taking beauty of Pithoragarh - 
Himalayas, wide expenses of grassy meadow, perennial streams roaring down the zig-zag course, a stupendous variety of flora and fauna, above all,
pure nature yet unsullied, seem to beckon the beholder into their folds, into  a charmed world of virgin beauty.

It was in the wake of  the Chinese aggression that on the  24th Feb. 1960, a sizeable section of Almora district was carved into  Pithoragarh  district 
containing extreme  border  areas with  its  head quarters in  Pithoragarh  town.  On 15th  September 1997,  the  Champawat Tehsil,  hitherto  under
Pithoragarh, was carved into Champawat district.

The Pithoragarh town  is  located  at  a height of  1645 meters above sea level.The district lies between 29.4° to 30.3° North latitude and  80°  to  81° 
East longitude along the eastern and  southern  part  of  the central   Himalayas  with Indo-Tibbetan  watershed  divide in  the north and  the Kali river forming a continuous border with Nepal  in  the  east. The Pithoragarh district   is  surrounded by the national  boundaries  of   Almora, Champawat, Bageshwar and Chamoli districts and extends over  an area of  7,217.7  sq. Kms
.



FOR MORE INFORMATION PL. OPEN LINK BELOW

http://pithoragarh.nic.in/Intro.htm
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One of the most striking regions in the hills of Uttaranchal is Pithoragarh, Kumaon’s easternmost district. The district headquarters, also called Pithoragarh, is wedged in between Nepal and Tibet, in the tiny Soar Valley of the Lesser Himalayas. The valley is flanked by four hills - Chandak, Dhwaj, Thal Kedar and Kundar - and is dramatic in its beauty.

Pithoragarh is in the heart of adventure country. In ancient times, the town had as many as six passes into Tibet, and it is still on the sacred Kailash-Mansarovar trail. Treks to the Milam and Namik Glaciers are kick-started here.

A number of adventure sports are possible in the region and there are private operators and camps that will organize them for you. Hang gliding, paragliding, trekking, skiing, canoeing, river rafting and fishing escapades await the audacious.

For the nature lover and wildlife enthusiast, there are hikes through Pithoragarh’s thick forests where you can spot snow leopards, musk deer and peafowl. The rolling meadows surrounding the town are soft with velvet grass and the scent of wild flowers - lovely for a lazy day in the sun!

Pithoragarh was the medieval bastion of the Chand rulers, who were great builders of temples. Many of them lie in ruins, but pilgrims still visit the others and festivals are celebrated here in a big way. Visit the Kapileshwar temple, an ancient cave-temple dedicated to Shiva; the Kamaksha temple; and the Kailash Ashram.

The Mostamanu is a famous temple near Chandak, 7 km from Pithoragarh, from where you can get a spectacular view of the snowy Himalayas - the peaks of Nanda Devi, Panchuli and Trishul. A 29 km trek uphill from the Soar valley takes you to Dhwaj and the temples of Shiva and Parvati. Thal Kedar, 16 km, is another pretty spot with Shiva temples where there is a grand Shivratri celebration each year.

Getting there: Pithoragarh is 503 km from Delhi, 330 km from Nainital, 212 km from Kathgodam, and 150 km from Tanakpur. Buses and taxis are available from Kathgodam and Tanakpur, the two nearest railheads. Pithoragarh has a small hill airstrip at Naini Saini, 5 km from town. If you are driving in from Delhi, breaking journey at Kathgodam or Nainital is convenient. Almora and Bageshwar are the main gas refuelling halts en route.

Best time: The months of March to June and mid-September to October are ideal for visiting Pithoragarh, while July to early September is the rainy season. Light woollens and rain protection is needed in summer, while heavy woollens are called for in winter.

Accommodation: Pithoragarh has a range of accommodation options, from the Forest Rest House and KMVN Tourist Rest House, to private hotels, resorts and campsites. For further information contact Tourist Office Pithoragarh, Tel 05964-22527, or District Information Office, Pithoragarh, Tel 05964-22549
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MAP OF PITHORAGARH
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