Author Topic: Details Of Tourist Places - उत्तराखंड के प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों का विवरण  (Read 4230 times)

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Online एम.एस. मेहता /M S Mehta

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« Reply #15 on: October 12, 2007, 04:18:00 PM »

टिहरी

नई टिहरी की स्थापना तब हुई जब भागीरथी पर विशाल टिहरी हाईडेल प्रोजेक्ट का निर्माण शुरू हुआ। नदी पर बांध बांधने तथा विशाल जलाशय टिहरी झील के बनने से पुरानी टिहरी के वासियों का पुर्नवास इस नये शहर में हो गया। अब नई टिहरी अपनी नई संस्कृति तथा अपना एक नया इतिहास रचने की प्रक्रिया में है। नये शहर में एक नई जीवन शैली, एक नई सोच तथा एक नई दृष्टि दिखायी पड़ती है। एक ओर समुदाय का अपनी विरासत तथा परंपरा की ओर गहरा लगाव है, दूसरी ओर वह उत्तराखंड की उन्नति एवं संपन्नता की दिशा में अग्रसर है।

नाम  :
 जिला कारागार, नई टिहरी
दूरभाष  :
 01376-232007
 
व्यक्ति गण (जिनसे संपर्क किया जा सकता है) :
 जेलर
स्थापना :
 वर्ष 1992 में सरकार द्वारा नई टिहरी में, (पहले वर्ष 1910 से पुरानी टिहरी में)

 
पारम्परिक/ ऐतिहासिक महत्त्व  :
 श्री देव सुमन, स्वतंत्रता सेनानी की हथकड़ी, 24 जुलाई, 1944 को 84 दिनों का ऐतिहासिक आमरण अनशन, और वे मर गये।

 
अन्य विशेषताएं/विशेष रूचि  :
 25 जुलाई (मेला) प्रदर्शनी की शुरूआत दिवस (प्रति वर्ष)
 
"जय १००८ मूल मूलनारायण जी की जय हो" !!
 

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« Reply #16 on: October 12, 2007, 04:19:48 PM »

दुगड्डा

सिलगढ़ एवं लंगूरगढ़ नदियों के बीच स्थित होने के कारण इस शहर का नाम दुगड्डा पड़ा। यह एक ऐसा शहर है जिसने अतीत में संपन्नता एवं उन्नति के दिन देखे हैं। 19वीं सदी के अंत एवं 20वीं सदी के प्रारंभ में यह एक महत्त्वपूर्ण वाणिज्यिक केंद्र था। पौड़ी, तत्कालीन टिहरी रियासत की राजधानी श्रीनगर एवं बद्रीनाथ के रास्ते में पड़ने के कारण यहीं से इन जगहों के लिये आवश्यक सामग्रियों की आपूर्ति की जाती थी। यहां सर्वदेशीय संस्कृति का विकास हुआ, क्योंकि सुदूर मारवाड़ से आकर व्यापारी इस धनी शहर में बस गये। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दौरान इसने कई जाने-माने स्वतंत्रता सेनानियों की मेजबानी की। आज यह सुप्त शहर आगन्तुकों को शांतिपूर्ण छुट्टी प्रदान करता है तथा गौरवशाली भविष्य के सपने दिखाता है।

ऐतिहासिक महत्व के स्थान

नाम :
 चन्द्रशेखर स्मृति वृक्ष
पता
 :
 दुगड्डा से 3 किलोमीटर दूर सेंधीखल-रथुआढ़ाब रोड पर, नाथुपुर गांव के नजदीक, पौड़ी गढ़वाल, उत्तरांचल
व्यक्ति गण (जिनसे संपर्क किया जा सकता है) :
 रेंज आफिसर, दुगड्डा
स्थित :
 दुगड्डा सेंधीखल-रथुआढ़ाब रोड
स्थापना :
 वर्ष 1930 में नगर पालिका दुगड्डा द्वारा 
बन्द :
 सभी दिन खुला
 
पारम्परिक/ऐतिहासिक महत्व :
 जुलाई 1930 में प्रशिक्षण के दौरान अपने क्रांतिकारी साथी (जो नजदीक के गांव नाथुपुर) हजारी लाल चैल बिहारी, विश्वेशरी दयाल तथा भवानी सिंह रावत के साथ शहीद चन्द्रशेखर आजाद के महान निशानेबाजी का यह पेड़ एक मुक गवाह है।
 
अन्य विशेषताएं/विशेष रूचि :
 शहीद चन्द्रशेखर आजाद तथा उनके साथियों को नाथुपुर गांव के निवासी भवानी सिंह रावत ने जुलाई 1930 के दौरान काकोरी डकैती के समय आमंत्रित किया था।

शहीद चन्द्रशेखर आजाद से जूड़े होने के सम्मान में नगर पालिका दुगड्डा द्वारा इस पेड़ के नजदीक चन्द्रशेखर आजाद मेमोरियल पार्क विकसित किया गया है। मई 1986 में भवानी सिंह रावत के समाधि का भी उदघाटन किया गया। प्रत्येक वर्ष 27 फरवरी को रामलीला मैदान, धनीराम बाजार, दुगड्डा में शहीद चन्द्रशेखर आजाद मेला आयोजित होता है तथा यहीं से शहीद यात्रा भी प्रांरभ होता है।
 

"जय १००८ मूल मूलनारायण जी की जय हो" !!
 

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« Reply #17 on: October 12, 2007, 04:53:03 PM »

कोटद्वार

कोटद्वार नाम का अर्थ होता है– कोट या पहाड़ी तथा द्वार अर्थात् पहाड़ियों का द्वार। प्रभावस्वरूप यह गढ़वाल की पहाड़ियों का प्रवेश द्वार है जो सदियों से रहा है। यह विकास का अग्रदूत भी है। आज यह हमारे उत्तराखंड का महत्वपूर्ण शहर है तथा राज्य में बड़ी मात्रा में वाणिज्य को नियंत्रित करता है। कई औद्योगिक इकाइयों के साथ इसका द्रुत औद्योगीकरण यहां हो रहा है, पर यहां एक गहरी परंपरा की जड़ों से प्रगतिशील उद्यमशीलता का भाव प्रमुख है। आगामी दिनों में उत्तराखंड में होने वाले सक्रिय परिवर्तनों में कोटद्वार की भूमिका महत्वपूर्ण साबित होगी।

ऐतिहासिक महत्व के स्थान (पूजा स्थल के अलावा)


नाम : कण्वाश्रम
स्थित : कोटद्वार से 12 किलोमीटर दूर पूरानी हरिद्वार रोड पर मलिन नदी के तट के किनारे
 
पारम्परिक/
ऐतिहासिक महत्व  : कण्व ऋषि का आश्रम वह स्थान है जहां ऋषि विश्वामित्र ने तपस्या किया था। इन्द्र ने उनकी साधना भंग करने के लिए मेनका नामक अप्सरा को भेजा। वह इसमें सफल रही तथा शकुंतला नामक पूत्री को जन्म दिया जिसका विवाह हस्तिनापुर के राजकुमार से हुआ एवं उन्होंने भरत को जन्म दिया। यह मान्यता है कि बाद में उनके ही नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा।

पुरातत्व के अनुसार असली आश्रम समय के साथ-साथ नष्ट हो गया लेकिन एक नया मंदिर का निर्माण लगभग 40 वर्षो पहले हुआ जहां कण्व, भरत, शकुंतला, दुष्यन्त तथा सिंह के शावकों की प्रतिमाएं हैं।
 
अन्य विशेषताएं/विशेष रूचि : ठहरने की व्यवस्था अतिथि गृह में उपलब्ध है, कण्वाश्रम गढ़वाल मंडल विकास 
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« Reply #18 on: October 12, 2007, 04:56:35 PM »

पौड़ी

कुमाऊं में अल्मोड़ा की तरह ही, गढ़वाल में पौड़ी को सबसे पुराना प्रशासनिक शहर होने की विशिष्टता प्राप्त है। वर्ष 1815 में यह ब्रिटिश गढ़वाल का प्रशासनिक केन्द्र बना और आज भी यह जिला एवं गढ़वाल मंडल का मुख्यालय है। शहर की प्रसिद्धि के अन्य दावे भी हैं। मेजर जनरल (अवकाश प्राप्त) बी. सी. खंडूरी (वर्तमान मुख्यमंत्री) तथा नरेन्द्र सिंह नेगी, गढ़वाल के प्रसिद्ध गीतकार, जैसे सर्वाधिक प्रसिद्ध लोगों का यह घर है। यह हिमालय का एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करता है तथा इसकी स्वास्थ्यवर्द्धक जलवायु एवं प्राकृतिक सुंदरता इसके आकर्षण को बढ़ा देते हैं। एक पर्यटक के रूप में आप पौड़ी की यात्रा संतोषजनक पायेंगे, चाहे वह मैदानों की गर्मी एवं धूल से दूर जाकर आराम के लिये हो, या यहां के स्थानों को देखना हो या मात्र यात्रा के लिये ही हो।

ऐतिहासिक महत्व के स्थान

 पौड़ी में एक महत्वपुर्ण ऐतिहासिक स्थल धारा रोड पर स्थित है-एक छोटा पत्थर का ढ़ांचा। पहले इस स्थान पर एक प्राकृतिक जल श्रोत था। यह एक समय में यहां के लोगों के लिए जल का मुख्य श्रोत था और यहां जल, नाग देवता मंदिर से गुल (एक पथरीला नाला) के द्वारा यहां पहुंचता था। बस स्टेण्ड से इस स्थान तक एक कीचड़ युक्त रास्ता हुआ करता था, जहां आजकल कुछ झोपड़ियां बसी हैं। इस जल श्रोत का शिलान्यास वर्ष 1844 में तत्कालीन पौड़ी के सहायक कमिश्नर हेनरी हेडले द्वारा रखा गया था, इस तथ्य को दो पत्थरों पर खुदाई कर, एक पर बाहरी तरफ तथा दूसरे पर अन्दर की तरफ दर्शाया गया है। अन्य एक छोटे गुफानुमा ढ़ांचे का अभिलेख अपठनीय है लेकिन एक स्थानीय इतिहासकार के अनुसार इस अभिलेख में एक स्थानीय राजा जिन्होंने इस क्षेत्र में एक शिव मंदिर की स्थापना किया है, का वर्णन है।

जब सड़क पौड़ी तक बन गया तब गुल द्वारा पानी का वितरण नष्ट कर दिया गया। पानी के वितरण के लिए एक पाइप बिछा दिया गया। जो भी हो, कई सारे छोटे पाइपों के इस एक में जुड़ जाने से यहां तक जल नहीं पहुंच पाता है।
 
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« Reply #19 on: October 13, 2007, 10:34:13 AM »

डीडीहाट

प्राकृतिक तौर पर सुंदर घाटी जहां डीडीहाट का छोटा पहाड़ी शहर स्थित है, उसकी विशिष्टता है– एक हरा-भरा वातावरण, छोटा पहाड़ी शिखर के मैदान में आबाद टीले, जहां अधिकांश घर बसे हैं तथा जिसके नीचे चरमगद नदी प्रवाहित है एवं कुछ दूरी पर बर्फ से ढकी पांचुली हिमालय ऋंखला का मनोहर दृश्य। हरित, उपजाऊ घाटी को ही हाट कहते हैं। डीडीहाट, कैलाश-मानसरोवर तीर्थयात्रा के मार्ग पर है एवं इसका नाम कुमाऊंनी भाषा के डंड या छोटी पहाड़ी से आया है।

नाम : श्री रघुनाथ मंदिर
सम्पर्क व्यक्ति : मंदिर कमिटी
स्थिति : एसडीएम कोर्ट के नजदीक 
आरती/ प्रार्थना का समय : प्रात: 5 बजे तथा सायं 5 बजे 
पूजित देवता (पूजित देवता अगर कोई हो) : रघुनाथ या भगवान राम
टिप्पणी/ विशेष बातें : पंचचुली पर्वत का मनोहर दृश्य
 
नाम : नन्दा देवी मंदिर
पता : नन्दा देवी मंदिर, डीडीहाट
सम्पर्क व्यक्ति : मंदिर कमिटी
स्थिति : तहसील कार्यालय के नजदीक 
आरती/ प्रार्थना का समय : प्रात: 7.30 बजे तथा सायं 5.30 बजे 
पूजित देवता (पूजित देवता अगर कोई हो) : नन्दा देवी या मां जगदम्बा
टिप्पणी/ विशेष बातें : नन्दा देवी, भगवान शिव का संगम तथा पार्वती का प्रत्यक्ष रूप है जो प्राचीन समय से पूजित है। प्रत्येक 12 वर्षों में भक्तगण नन्दा देवी राज जाट की पैदल यात्रा कर त्रिशूल पहूंच कर भगवती नन्दा देवी की पूजा कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं, इस दौरान मंदिर में भंडारा भी आयोजित किया जाता है।
 
 नाम : सीराकोट मंदिर
पता : डीडीहाट
स्थिति : शहर से दो किलोमीटर दूर तथा पहाड़ी की चोटी से एक मील दूर 
आरती/ प्रार्थना का समय : प्रात: 5 बजे तथा दोपहर 2 बजे 
पूजित देवता (पूजित देवता अगर कोई हो) : भगवान शिव
टिप्पणी/ विशेष बातें : मंदिर परिसर से हिमालय तथा डीडीहाट शहर का अतुलनीय सुन्दर दृश्य दिखाई पड़ता है। मंदिर के द्वार तक कच्चा सड़क निर्माणाधीन है जिनका 180 सीढ़ियों के हर एक सीढ़ी से एक सुन्दर मनोरम दृश्य उपस्थित होता है।

नाम : श्री मलय नाथ मंदिर
पता : डीडीहाट
स्थिति : शहर के दक्षिणी भाग में, टैक्सी स्टेण्ड के नजदीक 
आरती/ प्रार्थना का समय : प्रात: 5 बजे तथा 5 बजे सायं
पूजित देवता (पूजित देवता अगर कोई हो) : भगवान शिव
टिप्पणी/ विशेष बातें : यह मंदिर पेड़ों से घिरा है जो कई प्रकार के बागानों को पोषित करता है। यह मंदिर उच्च समतल भू-भाग का प्राकृतिक तथा नीचे के हरे-भरे खेतों का सुन्दर दृश्य भी उपस्थित करता है।
 
 नाम : शिव मंदिर
पता : गांधी चौक, डीडीहाट
आरती/ प्रार्थना का समय : प्रात: 5 बजे तथा 5 बजे सायं
पूजित देवता (पूजित देवता अगर कोई हो) : भगवान शिव
 
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« Reply #20 on: October 13, 2007, 10:43:18 AM »

श्रीनगर

पौराणिक काल से ही श्रीनगर का प्राचीन शहर, जो बद्रीनाथ के मार्ग में स्थित है, निरंतर बदलाव के बाद भी अपने अस्तित्व को बचाये रखा है। श्रीपुर या श्रीक्षेत्र उसके बाद नगर के बदलाव सहित श्रीनगर, टिहरी के अस्तित्व में आने से पहले एकमात्र शहर था। वर्ष 1680 में यहां की जनसंख्या 7,000 से अधिक थी तथा यह एक वाणिज्यिक केंद्र जो बाजार के नाम से जाना जाता था, पंवार वंश का दरबार बना। कई बार विनाशकारी बाढ़ का सामना करने के बाद अंग्रेजों के शासनकाल में एक सुनियोजित शहर के रूप में उदित हुआ और अब गढ़वाल का सर्वश्रेष्ठ शिक्षण केंद्र है। विस्थापन एवं स्थापना के कई दौर से गुजरने की कठिनाई के बावजूद इस शहर ने कभी भी अपना उत्साह नहीं खोया और बद्री एवं केदार धामों के रास्ते में तीर्थयात्रियों की विश्राम स्थली एवं शैक्षणिक केंद्र बना रहा है और अब भी वह स्वरूप विद्यमान है।

नाम : दुर्गा मंदिर, शारदानाथ घाट
 
पता : अलकनंदा के तट पर
 
सम्पर्क व्यक्ति : शांता गिरि
 
दिशा :  नदी के तट पर, अपर बाजार
 
आरती/प्रार्थना का समय : 6 से 7 बजे सायं
 
पूजित देवता (अगर कोई हों) : दुर्गा मां
 
पारम्परिक/ ऐतिहासिक महत्व
 :
 वर्ष 1967 में नया मंदिर परिसर शारदानाथ बाबा द्वारा बनवाया गया।
 
 
  नाम  :  केशोराय मठ
 
पता  : अलकनंदा तट के करीब, कमलेश्वर मंदिर के नीचे
 
दिशा : अलकनंदा के तट पर
 
 
पारम्परिक/
ऐतिहासिक महत्व :  एटकिंस द्वार हिमालयन गजेटियर में इस मंदिर का निर्माण वर्ष 1625 में बताते हैं। इसका खंडहर यह बताता है कि उस समय यह मंदिर कितना भव्य होगा। यह महसूस कर आपको शर्मिन्दगी होगी कि इसे नष्ट होने की अनुमति दी गई। इसके जड़ में पीपल के पेड़ उग गये, प्रवेश द्वार को नष्ट कर दिया गया तथा जहां असली मूर्ति स्थापित था वह स्थान खाली पड़ा है।
 
 नाम : शीतला देवी मंदिर
 
पता :  भक्तियाना, श्रीनगर
 
पूजित देवता
(अगर कोई हों)
 :
 शीतला मां
 
पारम्परिक/
ऐतिहासिक महत्व
 :
 यह देवी, भक्तियाना क्षेत्र की इष्ट देवी मानी जाती हैं।
 
 नाम :  लक्ष्मी-नारायण मंदिर
 
पता :  तिवारी मोहल्ला, श्रीनगर
 
सम्पर्क व्यक्ति  :  राकेश तिवारी
 
दिशा :  अलकनंदा के तट पर, तिवारी मोहल्ला
 
पूजित देवता  : लक्ष्मी-नारायण
 
 
पारम्परिक/
ऐतिहासिक महत्व :  यह मंदिर नगर शैली डिजाइन में बनाया गया है। इस मंदिर के प्रमुख पवित्र हॉल में चार भुजाओं वाले भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित है जो पुराने राजमहल की ओर मुखातिब है। यह संभव है कि पंवार राजा गण प्रतिदिन इस मंदिर में प्रार्थना करते थे। यह भी संभव है कि यही वह प्रतिमा है जिसे मानशाह तिब्बत से लाये थे। यह महसूस किया जाता है कि असली मंदिर अलकनंदा के तट पर उत्तर की ओर बनाया गया, बाद में इसे सुरक्षित रखने के लिए पुन: स्थापित किया गया। बिरेही बाढ़ के बाद अलकनंदा इस मंदिर के और करीब स्थानांतरित हो गई।
 
 
टिप्पणी/ विशेष बातें
 :
 स्थानीय लोग इस मंदिर के पुन: ठीक-ठाक करने के लिए कार्य कर रहे हैं। यहां एक अन्य मंदिर सत्यनारायण का था जो नष्ट कर दिया गया।
 
 
 नाम   :  लक्ष्मी-नारायण मंदिर/शंकरामठ
 
पता  :  एसएसबी, श्रीनगर
 
दूरभाष  :  09319477624
 
सम्पर्क व्यक्ति  :  महु प्रसाद उन्नियाल
 
आरती/प्रार्थना का समय  :  6 बजे सायं
 
पूजित देवता   :  देवी लक्ष्मी तथा भगवान विष्णु, राज राजेश्वरी, कृष्ण
 
 
पारम्परिक/
ऐतिहासिक महत्व  :  यह स्थान ठाकुर द्वारा भी कहलाता है। वर्ष 1670 में फतेहपति शाह द्वारा जारी एक ताम्रपत्र के अनुसार तत्कालीन धर्माधिकारी शंकर धोमल ने यहां जमीन खरीदा तथा राजमाता की अनुमति से मंदिर की स्थापना की।
मंदिर में विशाल मंडप बना है, चूंकि उसमें कोई खंभा नहीं है इसलिए यह तत्कालीन पाषाण वास्तुकला की खोज का एक उदाहरण है।

मंदिर के मुख्य भवन में ढ़ाई मीटर ऊंचा एक सुंदर प्रतिमा लक्ष्मी-नारायण का स्थापित है। ऐसा मालूम पड़ता है कि यह दक्षिण से लाया गया था। दूसरी प्रतिमा भगवान विष्णु की, ठीक उसके बगल में स्थापित है।
 
 नाम  :  लक्ष्मी-नारायण मंदिर
 
पता  :  नागेश्वर गली, श्रीनगर
 
दूरभाष  :  03146-211049
 
सम्पर्क व्यक्ति  :  श्री भगवती प्रसाद बदोनी, पुजारी
 
दिशा  :  सरस्वती विद्या मंदिर के नजदीक
 
आरती/प्रार्थना का समय
 :
 प्रात: 6 बजे से 7:30 बजे सायं
 
पूजित देवता
 :
 लक्ष्मी-नारायण तथा हनुमान
 
 
पारम्परिक/
ऐतिहासिक महत्व
 :
 यह कहा जाता है कि एक बार लंका पर पूल बना, उनमें कुछ पत्थर बच गए जिसमें ‘राम’ लिखा था। हनुमान ने भगवान राम को सलाह दिया कि उन पत्थरों पर लिखे नाम को लोगों द्वारा ठोकर मारने के लिए नहीं छोड़ देना चाहिए इसलिए उन पत्थरों को लाकर गढ़वाल में यह मंदिर बनवा दिया गया।
 
 
टिप्पणी/ विशेष बातें
 :
 हनुमान की प्रतिमा को वर्ष 1200 के बाद से बचाकर रखा गया और बाद में यहां लाया गया।
 
 
 नाम   :  कमलेश्वर/सिद्धेश्वर मंदिर
 
पता  :  अलकनंदा तट के करीब, श्रीनगर
 
सम्पर्क व्यक्ति   :  आशुतोष पुरी, महंत
 
दिशा
 :
 अलकनंदा तट के करीब
 
पूजित देवता
 :
 भगवान शिव, गणेश, देवी अन्नपूर्णा
 
 
पारम्परिक/
ऐतिहासिक महत्व
 :
 यह श्रीनगर का सबसे अधिक श्रद्धेय एवं पूजित मंदिर है। यह कहा जाता है कि जब देवता गण राक्षसों के साथ युद्ध हार रहे थे तो भगवान विष्णु सुदर्शन चक्र पाने के लिए इसी स्थान पर भगवान शिव का तप किया था। उन्होंने भगवान शिव के 1,000 नामों में से एक-एक का उच्चारण कर कुल 1,000 कमल (कमल जिससे मंदिर का नाम जुड़ा है) फूल चढ़ाये। उन्हें जांचने के लिए भगवान शिव ने एक फूल छिपा लिया। जब भगवान विष्णु को ज्ञात हुआ कि उनके पास एक फूल कम है तो उन्होंने तुरंत एक फूल के बदले अपनी आंख (जो कमल भी कहलाता है) चढ़ा दिया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें सुदर्शन चक्र दिया जिससे भगवान विष्णु ने असुरों का संहार किया।
चूंकि भगवान विष्णु ने कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष चतुर्दशी को सुदर्शन चक्र धारण किया था इसलिए यहां बड़े धूमधाम से बैकुंठ चतुर्दशी मनाया जाता है। इसी दिन दम्पत्ति जो पुत्र की प्राप्ति चाहते हैं, वे हाथों में दीप जलाकर रातभर खड़े होकर प्रार्थना करते हैं। यह कहा जाता है उनकी इच्छाएं पूर्ण होती है। यह खाद रात्रि कहलाती है तथा यह कहा जाता है कि भगवान कृष्ण ने स्वयं यही पूजा इस मंदिर में किया था।

इस मंदिर का निर्माण, कहा जाता है कि आदी शंकराचार्य के निवेदन पर भगवान ब्रह्मा ने रातों-रात कर दिया जो कि गढ़वाल के ऐसे 1,000 मंदिरों में से एक है। यह वास्तव में एक खुला मंदिर है जो 12 सुंदर नक्काशी किये पत्थरों पर टिका है। सम्पूर्ण मंदिर भवन काले पत्थरों का बना है जो कि पेंटिंग कर सुरक्षित कर दिया गया। बिरला परिवार ने वर्ष 1960 में इस मंदिर का पुनरूद्धार कर इसमें दीवार लगवा दिया।

यहां का शिवलिंग स्वयंभू तथा मंदिर से भी पूर्व (पूराना) का है। यह कहा जाता है कि गोरखों ने इस शिवलिंग को खोदने की कोशिश की लेकिन जमीन में 122 फीट गहरे खुदाई के बाद भी इसका छोर नहीं मिला। उसके बाद उन्होंने माफी मांगी, धरती की खुदाई को ढ़क दिया तथा यह कहा कि इस मंदिर की खुदाई कर छेड़-छाड़ करना अनुचित है तथा यह एक पवित्र मंदिर है। 
 
टिप्पणी/विशेष बातें :
 एटकिंस द्वार हिमालयन गजेटियर में इस मंदिर का निर्माण वर्ष 1625 में बताते हैं। इसका खंडहर यह बताता है कि उस समय यह मंदिर कितना भव्य होगा। यह महसूस कर आपको शर्मिन्दगी होगी कि इसे नष्ट होने की अनुमति दी गई। इसके जड़ में पीपल के पेड़ उग गये, प्रवेश द्वार को नष्ट कर दिया गया तथा जहां असली मूर्ति स्थापित था वह स्थान खाली पड़ा है।
 
 
   नाम  :  श्री बद्रीनाथ मंदिर
 
पता  :  वीर चन्द सिंह गढ़वाली मार्ग, श्रीनगर
 
दूरभाष
 :
 01346-253556
 
सम्पर्क व्यक्ति
 :
 पी भट्ट
 
दिशा
 :
 कल्याणेश्वर मंदिर के नजदीक
 
आरती/प्रार्थना का समय
 :
 प्रात: 8 बजे तथा 6 बजे सायं
 
पूजित देवता
 :
 भगवान विष्णु
 
 
पारम्परिक/
ऐतिहासिक महत्व
 :
 माना जाता है कि इस छोटे मंदिर की प्रतिमा पहले तिवारी मोहल्ला में लक्ष्मी-नारायण मंदिर के नजदीक सत्यनारायण मंदिर में स्थापित था।
 
      नाम
 :
 कल्याणेश्वर मंदिर
 
पता
 :
 गोला बाजार, श्रीनगर
 
सम्पर्क व्यक्ति
 :
 राधु शाम गुप्ता, प्रबंधक
 
दिशा
 :
 गोला बाजार में
 
आरती/प्रार्थना का समय
 :
 प्रात: 8.30 बजे और 7.30 बजे सायं
 
पूजित देवता
 :
 भगवान शिव
 
पारम्परिक/
ऐतिहासिक महत्व
 :
 इस मंदिर की स्थापना तीन पुश्तों पहले एक अग्रवाल परिवार द्वरा कराया गया।
 
टिप्पणी/ विशेष बातें
 :
 मंदिर में एक सत्संग हॉल तथा एक धर्मशाला है।
 
       नाम
 :
 हनुमान मंदिर
 
पता
 :
 अपर बाजार, गंगा घाट, श्रीनगर
 
सम्पर्क व्यक्ति
 :
 श्री भगवती प्रसाद बदोनी, पुजारी
 
दिशा
 :
 अपर बाजार
 
आरती/प्रार्थना का समय
 :
 प्रात: 5 बजे तथा 6 बजे सायं
 
पूजित देवता
 :
 हनुमान और गरूड़
 
पारम्परिक/
ऐतिहासिक महत्व
 :
 130 से अधिक वर्षों पुराना, स्थानीय लोगों द्वारा बनवाया गया।
 
टिप्पणी/ विशेष बातें
 :
 हनुमान मंदिर में हनुमान तथा गरूड़ दोनों की प्रतिमा अगल-बगल में स्थापित है।
 
 

      नाम
 :
 हेमकुण्ड साहिब
 
पता
 :
 गोला बाजार, श्रीनगर
 
दूरभाष
 :
 01346-252203
 
मोबाइल
 :
 09927218805
 
सम्पर्क व्यक्ति
 :
 ज्ञानी सुरेन्द्र सिंह
 
दिशा
 :
 गोला बाजार
 
Prayer समय
 :
 प्रात: 4:15 बजे और 6:30 बजे सायं
 
 
पारम्परिक/
ऐतिहासिक महत्व
 :
 यह कहा जाता है कि अभी जहां यह गुरूद्वारा है वहां पहले एक बगीचा था जहां तीर्थ यात्रियों के ठहरने का एक छोटा सा स्थान बना था। एक तीर्थयात्री गुरू गोविंद सिंह का लिखा कुछ पवित्र पंक्तियां लाया जिसे सुरक्षित रखने के लिए यह गुरूद्वारा बना। वे अभी भी इस गुरूद्वारा में सुरक्षित हैं।
 
 
विशेष बातें
 :
 हेमकुण्ड साहिब की पवित्र यात्रा वर्ष 1937 में प्रारंभ हुआ एवं इस पवित्र स्थान तक पैदल आने वाले भक्तों को ठहरने तथा भोजन की व्यवस्था के लिए गुरूद्वारा कमीटी की स्थापना की गई। इस प्रकार के कई गुरूद्वारा की स्थापना हेमकुण्ड साहिब के रास्ते में की गई, तथा यह हरिद्वार और ऋषिकेश के बाद यह तीसरा है।
 
      नाम
 :
 नागेश्वर मंदिर
 
पता
 :
 नागेश्वर गली, श्रीनगर
 
मोबाइल
 :
 09410123593
 
सम्पर्क व्यक्ति
 :
 उमानन्द पुरी
 
दिशा
 :
 शिशु मंदिर विद्यालय के नजदीक
 
आरती/प्रार्थना का समय
 :
 प्रात: 5 बजे और 7 बजे सायं
 
पूजित देवता
 :
 गणेश के साथ भगवान शिव, पार्वती तथा पंच देव
 
 
पारम्परिक/
ऐतिहासिक महत्व
 :
 अलकनंदा के नजदीक एक नाग कुंड था। पांच पुश्तों पहले इस प्रतिमा को वर्तमान स्थान पर लाया गया। उसके बाद से इसी स्थान पर शिवलिंग की पूजा की जाती है।
 
 
नाम
 :
 गोरखनाथ मंदिर
 
पता
 :
 नागेश्वर गली, श्रीनगर
 
सम्पर्क व्यक्ति
 :
 श्री गोपाल नाथ जी
 
दिशा
 :
 नागेश्वर मंदिर के नजदीक
 
आरती/प्रार्थना का समय
 :
 प्रात: 5:30 बजे और 7:30 बजे सायं
 
पूजित देवता
(अगर कोई हों)
 :
 भैरव जी और गोरखनाथ जी
 
पारम्परिक/
ऐतिहासिक महत्व
 :
 यह 13वीं सदी का मंदिर है।
 
टिप्पणी/ विशेष बातें
 :
 एकल चट्टान से इस मंदिर का नक्काशी (निर्माण) किया गया है। यह मंदिर सिद्धेश्वर महादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है।
 
       नाम
 :
 गोरखनाथ गुफा मंदिर
 
पता
 :
 भक्तियाना, श्रीनगर
 
दिशा
 :
 भक्तियाना में
 
पूजित देवता
 :
 गोरखनाथ जी तथा भगवान शिव
 
 
पारम्परिक/
ऐतिहासिक महत्व
 :
 सुंदर प्रतिमा, गुफा पर नक्काशी, तथा ताम्र पत्र यह साबित करता है कि यह पूजा का प्राचीन स्थान है। यह एक मध्य तथा दक्षिण गढ़वाल का महत्वपूर्ण गुफा मंदिर है।
यह कहा जाता है कि यह गोरख आश्रम के त्रियुगनारायण का सर्दी कालीन आवास था जैसा कि स्कन्द पुराण के केदारखंड में वर्णन किया गया है। एक ताड़पत्र जो कल्पद्रुम यंत्र यहां उपलब्ध है, का मंत्रोच्चार करने से मुक्ति प्राप्त होती है।

मुख्य गुफा में एक लिंग तथा अष्टधातु का बना गुरू गोरखनाथ का एक प्रतिमा है। इसके ठीक सामने गुरू गोरखनाथ का चरण पादुका है।
 
 
टिप्पणी/ विशेष बातें
 :
 मुख्य गुफा 3 मीटर लम्बा तथा 2 मीटर चौड़ा है। इसके बाहर 4 खंभों का चबूतरा है जिस पर 1812 अभिलेख अंकित है। मंदिर में एक ताम्र पत्र भी संभालकर रखा गया है जो फतेहपति शाह द्वारा बालकनाथ जोगी को दिया गया था।

नाम : माता कंसमर्दनी मंदिर
 
पता : कंसमर्दनी मार्ग, श्रीनगर
 
सम्पर्क व्यक्ति : मुरलीधर घिरदियाल, पुजारी
 
दिशा :  सेंट टेरेसा स्कूल के नजदीक
 
पूजित देवता
(अगर कोई हों)
 :
 माता कंसमर्दनी
 
पारम्परिक/ऐतिहासिक महत्व
 :
 यह कहा जाता है कि देवी एक खेत (भूमि) में उपस्थित हुई। उन्होंने किसान को वहां हल चलाने एवं उन्हें वहां से निकालकर वस्त्र पहनाकर उन्हें एक डोली में बिठाने को कहा। उन्होंने ऐसा ही किया तथा उनकी सुरक्षा के लिए एक छोटा ढ़ांचा भी बनाया। इस मंदिर को गोरखा राज्य के दौरान वर्ष 1803-1815 में बनाया गया, तथा मंदिर के मुख्य भवन में वर्ष 1809 का अभिलेख सुत्ज्यामन थापा के बारे में लिखा है।
 
 
टिप्पणी/ विशेष बाते :  यह देवी घिरदियाल वंश के तथा इस परिवार के लोगों का इष्ट देवी है तथा उनके द्वारा इस मंदिर में सदियों से पूजित है।

नाम :  अलकेश्वर महादेव मंदिर
 
पता: नर्सरी रोड, श्रीनगर
 
मोबाइल: 09411585376
 
सम्पर्क व्यक्ति : श्री दुर्गा प्रसाद बनवारा
 
आरती/प्रार्थना का समय : 6 बजे सायं
 
पूजित देवता : शिवलिंग
 
पारम्परिक/ ऐतिहासिक महत्व :  वर्तमान मंदिर का निर्माण वर्ष 1901 में हुआ जो बाढ़ में नष्ट हुए मंदिर का स्थान धारण किया।
 
टिप्पणी/ विशेष बाते :  धनुष तीर्थ: वह स्थान जहां यह मंदिर बना है, का वर्णन स्कंद पुराण में धनुष तीर्थ के रूप में है।
 
 
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« Reply #21 on: October 13, 2007, 10:45:10 AM »

धारचूला।

काली नदी भारत एवं नेपाल के बीच प्राकृतिक सीमा है और इसके किनारे स्थित है– धारचूला। यह प्राचीन काल में हिमालय पार पथ पर व्यापारिक शहर रहा था। वर्ष 1962 में भारत-तिब्बत व्यापार मार्ग बंद हो जाने के बाद कई भोटिया व्यापारियों ने धारचूला को ग्रीष्मकालीन घर की तरह इस्तेमाल करने की बजाय, वहां बसना ही पसंद किया। आज धारचूला की संपन्न संस्कृति में भोटिया, कुमाऊं एवं नेपाल की परंपरा तथा लोगों का मिश्रण है। भोटिया, हिन्दुओं एवं जैनियों का धार्मिक स्थल कैलाश-मानसरोवर का रास्ता धारचूला होकर जाता है।

नाम : हनुमान मंदिर
पता : जीआईसी रोड, धारचूला
स्थिति : जल संस्थान कार्यालय के नजदीक 
आरती/प्रार्थना का समय : प्रात: 5 बजे से सायं 7.30 बजे
पूजित देवता
(अगर कोई हों) : हनुमान
 

नाम : शिव मंदिर
पता : थुसिल रोड, धारचूला
स्थिति : एसडीएम निवास के नजदीक 
आरती/प्रार्थना का समय : प्रात: 5 बजे से सायं 7 बजे
पूजित देवता
(अगर कोई हों) : भगवान शिव

ऐतिहासिक महत्त्व के स्थान

 धारचूला में नहीं है, निकटतम स्थान है: पिथौरागढ़


 


 



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« Reply #22 on: October 13, 2007, 10:47:28 AM »

लोहाघाट

लोहाघाट लंबे देवदार एवं बलूत पेड़ों के बीच लोहावती नदी के किनारे स्थित है तथा यह चंपावत जिले के सर्वाधिक सौंदर्यपूर्ण स्थलों में से एक है। यह एक ग्रामीण स्थल है, जहां शहर के कोलाहल से दूर छुट्टी बितायी जा सकती है। आपको फिर से जोश भर देने में शहर की प्राकृतिक सुंदरता के साथ शिथिल पुराने सांसारिक परिवेश, का अद्भुत योगदान होगा। पड़ोसी क्षेत्रों में कुछ घुमने योग्य स्थान भी हैं जहां रहस्य, ऐतिहासिक तथा साहसिक कार्यों का मिश्रण देखने को मिलता है।

पूजा के स्थल

नाम : रीकेश्वर महादेव मंदिर
पता : चम्पावत मार्ग पर, शहर से एक किलोमीटर दूर
सम्पर्क व्यक्ति : वासुदेव, पुजारी
दिशा : पेट्रोल पम्प के नजदीक
आरती/प्रार्थना का समय : प्रात: 8 बजे से 7.30 बजे सायं 
बन्द : सप्ताह के सातों दिन
पूजित देवता
(अगर कोई हों) : भगवान शिव
 

ऐतिहासिक महत्त्व के स्थान

 लोहाघाट में नहीं है, निकटतम स्थान है: चंपावत
 

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« Reply #23 on: October 13, 2007, 10:50:01 AM »
टनकपुर

शारदा नदी के किनारे तराई में स्थित टनकपुर, एक शांत और छोटा शहर है, जिसकी स्थापना की कल्पना सुविधा के लिये की गई है। सड़के एवं पैदल पथ चौड़े है तथा आराम से पैदल चलकर शहर में विचरण करना सहज है।
टनकपुर में समय बिताने का सर्वोत्तम तरीका नीचे उतरकर शारदा घाट पहुंचना और वहां तट पर समय बिताना है। नदी एवं अन्य चीजों को देखना है। यह शहर पूज्य पूर्णागिरि मंदिर का प्रवेश द्वार है तथा यह पास के क्षेत्रों में घुमने का आकर्षक अवसर भी देता है।

ऐतिहासिक महत्व के स्थान

नाम : शारदा घाट मां पूर्णागिरि
पता : बस स्टेशन के करीब, टनकपुर
सम्पर्क व्यक्ति : नगर पालिका से मान्यता प्राप्त
दिशा : एनएचपीसी बरसेगी रोड के नजदीक
बन्द : सभी दिन खुला
पारम्परिक/
ऐतिहासिक महत्त्व : मां पूर्णागिरि मंदिर में पूजा करने से पहले लोग यहां स्नान करने आते हैं।
विशेष बातें : मुंडन के लिये 101 रूपये, जूता रखने के लिये 2.50 रूपये तथा पार्किंग के 100 रूपये शुल्क लिये जाते है।
 
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« Reply #24 on: October 13, 2007, 10:52:45 AM »

पिथौरागढ़

प्राय: लघु कश्मीर कहा जाने वाला पिथौरागढ़, कुमाऊं के सर्वाधिक सुंदर स्थलों में से एक है। यहां बर्फ से लदी हिमालय की चोटियां बहुत पास दिखती है, हवा बिल्कुल साफ, आकाश और अधिक नीला तथा घुमावदार खेत और अधिक हरे-भरे दिखते हैं, जो वास्तव में यात्रियों को एहसास करा देता है कि कश्मीर को छोड़कर एक अन्य स्वर्ग यहां भी है। यह एक मध्यकालीन शहर है जिसकी समृद्ध विरासत है और पिथौरागढ़ जिले का मुख्यालय भी।

नाम : कामाख्या देवी मंदिर
पता : शहर से 5 किलोमीटर दूर, कन्टोनमेंट से ऊपर
आरती/प्रार्थना का समय : प्रात: 7 बजे से 8 बजे सायं
बन्द : सभी दिन खुला
पूजित देवता
(अगर कोई हों) : कामाख्या देवी
पारंपरिक/
ऐतिहासिक महत्त्व : वर्ष 1990 में मंदिर निर्मित।
विशेष बातें : मंदिर से आप हवाई पट्टी तथा हरे धान के खेतों को देख सकते हैं।

नाम : थुलीगढ़ गुरूद्वारा
पता : कन्टोमेंट क्षेत्र, पिथौरागढ़
 
प्रार्थना का समय : सुबह – नितनाम 5 बजे प्रात:
शाम – रहरास 7 बजे सायं
रविवार – लंगर (60 से 200 लोग)
 
पारंपरिक/
ऐतिहासिक महत्त्व : वर्ष 1997 में भवन निर्मित, पिथौरागढ़ में कार्यरत आर्मी जवानों द्वारा देखरेख।
 

नाम : सेंट्रल मेथोदिस्ट चर्च
पता : पिथौरागढ़
दिशा : सिलथम चौक
प्रार्थना का समय : 4.30 बजे सायं 
बन्द : रविवार को खुला
पारंपरिक/
ऐतिहासिक महत्त्व : यह वर्ष 1879 

नाम : मोस्तामनु मंदिर
पता : मोस्तामनु गांव, पिथौरागढ़
दूरभाष : 05964-211025
सम्पर्क व्यक्ति : श्री गिरीश चन्द जोशी
दिशा : पिथौरागढ़ से 7-8 किलोमीटर दूर
आरती/प्रार्थना का समय : प्रात: 4.30 बजे तथा 6.30 से 7 बजे सायं
बन्द : सप्ताह के सातों दिन खुला
पूजित देवता : भगवान शिव, नेपालियों द्वारा मोस्ता देवता कहे जाते थे।
 
विशेष बातें : भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर ग्रामीणों द्वारा वर्ष 1929 में बनवाया गया। जब कभी सुखा पड़ता है, सम्पूर्ण जिला के लोग मिलकर धन इकट्ठा कर वर्षा होने के लिये इस मंदिर में यज्ञ करते हैं। शक्तिपीठ, जिसके आस-पास मंदिर बना है धारचूला के रास्ते नेपाल से लाया गया तथा पिथौरागढ़ के राजश्री देवता को समर्पित है।
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« Reply #25 on: October 13, 2007, 10:55:19 AM »

चंपावत

कुमाऊं के चंद शासकों की प्रथम राजधानी, चंपावत, संस्कृति एवं कला की धनी विरासत का एक प्राचीन शहर है। 10वीं से 18वीं सदी के बीच यहाँ उदित धार्मिक विश्वासों तथा सांस्कृतिक विचारों का अब भी कुमाऊं में पालन किया जाता है। यहां का बालेश्वर मंदिर बीते युगों के गौरव का झलक दिखाता है तथा चंपावत की यात्रा अतीत की आकर्षक झलकियों को देखने के समान है।



ऐतिहासिक महत्व के स्थान

नाम : राजा चबूतरा 
 
ऐतिहासिक महत्त्व : राजा का चबूतरा नगर पंचायत के पीछे है, जब बालेश्वर मंदिर बना था उसी समय यह चबूतरा भी उसी शैली में बना है। तब उस समय की जो इसकी आकृति थी वो इस समय में बिल्कुल नहीं है, लेकिन प्राचीन समय में राजा चंद इस जगह का इस्तेमाल सभा की बैठक तथा न्याय दिलाने के लिये करता था।

« Last Edit: October 13, 2007, 11:53:15 AM by M S Mehta »
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« Reply #26 on: October 13, 2007, 01:15:00 PM »

नैनीताल

कुमाऊँ क्षेत्र में नैनीताल जिले का विशेष महत्व है। देश के प्रमुख क्षेत्रों में नैनीताल की गणना होती है। यह 'छखाता' परगने में आता है। 'छखाता' नाम 'षष्टिखात' से बना है। 'षष्टिखात' का तात्पर्य साठ तालों से है। इस अंचल मे पहले साठ मनोरम ताल थे। इसीलिए इस क्षेत्र को 'षष्टिखात' कहा जाता था। आज इस अंचल को 'छखाता' नाम से अधिक जाना जाता है। आज भी नैनीताल जिले में सबसे अधिक ताल हैं।

यहाँपर 'नैनीताल' जो नैनीताल जिले के अन्दर आता है। यहाँ का यह मुख्य आकर्षण केन्द्र है। तीनों ओर से घने-घने वृक्षों की छाया में ऊँचे - ऊँचे पहाड़ों की तलहटी में नैनीताल समुद्रतल से १९३८ मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। इस ताल की लम्बाई १,३५८ मीटर, चौड़ाई ४५८ मीटर और गाहराई १५ से १५६ मीटर तक आंकी गयी है। नैनीताल के जल की विशेषता यह है कि इस ताल में सम्पूर्ण पर्वतमाला और वृक्षों की छाया स्पष्ट दिखाई देती है। आकाश मण्डल पर छाये हुए बादलों का प्रतिविम्भ इस तालाब में इतना सुन्दर दिखाई देता है कि इस प्रकार के प्रतिबिम्ब को देखने के लिए सैकड़ो किलोमीटर दूर से प्रकृति प्रेमी नैनीताल आते - जाते हैं। जल में विहार करते हुए बत्तखों का झुण्ड, थिरकती हुई तालों पर इठलाती हुई नौकाओं तथा रंगीन बोटों का दृश्य और चाँद - तारों से भरी रात का सौन्दर्य नैनीताल के#े ताल की शोभा बढ़ाने में चार - चाँद लगा देता है। इस ताल के पानी की भी अपनी विसेषता है। गर्मियों में इसका पानी हरा, बरसात में मटमैला और सर्दियों में हल्का नीला हो जाता है।
 


नैनीताल के ताल के दोनों ओर सड़के हैं। ताल का मल्ला भाग मल्लीताल और नीचला भाग तल्लीताल कहलाता है। मल्लीताल में फ्लैट का खुला मैदान है। मल्लीताल के फ्लैट पर शाम होते ही मैदानी क्षेत्रों से आए हुए सैलानी एकत्र हो जाते हैं। यहाँ नित नये खेल - तमाशे होते रहते हैं। संध्या के समय जब सारी नैनीताल नगरी बिजली के प्रकाश में जगमगाने लगती है तो नैनीताल के ताल के देखने में ऐसा लगता है कि मानो सारी नगरी इसी ताल में डूब सी गयी है। संध्या समय तल्लीताल से मल्लीताल को आने वाले सैलानियों का तांता सा लग जाता है। इसी तरह मल्लीताल से तल्लीताल (माल रोड) जाने वाले प्रकृतिप्रेमियों का काफिला देखने योग्य होता है।

नैनीताल, पर्यटकों, सैलानियों पदारोहियों और पर्वतारोहियों का चहेता नगर है जिसे देखने प्रतिवर्ष हजारों लोग यहाँ आते हैं। कुछ ऐसे भी यात्री होते हैं जो केवल नैनीताल का "नैनी देवी" के दर्शन करने और उस देवी का आशीर्वाद प्राप्त करने की अभिलाषा से आते हैं। यह देवी कोई और न होकर स्वयं 'शिव पत्नी' नंदा (पार्वती) हैं। यह तालाब उन्हीं की स्मृति का द्योतक है। इस सम्बन्ध में पौराणिक कथा कही जाती है।

नैनीदेवी का नैनीताल : पौराणिक कथा के अनिसार दक्ष प्रजापति की पुत्री उमा का विवाह शिव से हुआ था। शिव को दक्ष प्रजापति पसन्द नहीं करते थे, परन्तु यह देवताओं के आग्रह को टाल नहीं सकते थे, इसलिए उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह न चाहते हुए भी शिव के साथ कर दिया था। एक बार दक्ष प्रजापति ने सभी देवताओं को अपने यहाँ यज्ञ में बुलाया, परन्तु अपने दामाद शिव और बेटी उमा को निमान्त्रण तक नहीं दिय। उमा हठ कर इस यज्ञ में पहुँची। जब उसने हरिद्वार स्थित कनरवन में अपने पिता के यज्ञ में सभी देवताओं का सम्मान और अपने पति और अपनी निरादर होते हुए देखा तो वह अत्यन्त दु:खी हो गयी। यज्ञ के हवनकुण्ड में यह कहते हुए कूद पड़ी कि 'मैं अगले जन्म में भी शिव को ही अपना पति बनाऊँगी। अपने मेरा और मेरे पति का जो निरादर किया इसके प्रतिफल - स्वरुप यज्ञ के हवन - कुण्ड में स्यवं जलकर आपके यज्ञ को असफल करती हूँ।' जब शिव को यह ज्ञात हुआ कि उमा सति हो गयी, तो उनके क्रोध का पारावार न रहा। उन्होंने अपने गणों के द्वारा दक्ष प्रजापति के यज्ञ को नष्ट - भ्रष्ट कर डाला। सभी देवी - देवता शिव के इस  रौद्र - रुप को देखकर सोच में पड़ गए कि शिव प्रलय न कर ड़ालें। इसलिए देवी - देवताओं ने महादेव शिव से प्रार्थना की और उनके क्रोध के शान्त किया। दक्ष प्रजापति ने भी क्षमा माँगी। शिव ने उनको भी आशीर्वाद दिया। परन्तु, सति के जले हुए शरीर को देखकर उनका वैराग्य उमड़ पड़ा। उन्होंने सति के जले हुए शरीर को कन्धे पर डालकर आकाश - भ्रमण करना शुरु कर दिया। ऐसी स्थिति में जहाँ - जहाँ पर शरीर के अंग किरे, वहाँ - वहाँ पर शक्ति पीठ हो गए। जहाँ पर सती के नयन गिरे थे ; वहीं पर नैनादेवी के रुप में उमा अर्थात् नन्दा देवी का भव्य स्थान हो गया। आज का नैनीताल वही स्थान है, जहाँ पर उस देवी के नैन गिरे थे। नयनों की अप्पुधार ने यहाँ पर ताल का रुप ले लिया। तबसे निरन्तर यहाँ पर शिवपत्नी नन्दा (पार्वती) की पूजा नैनादेवी के रुप में होती है।

यह भी एक विशिष्ट उदाहरण है कि समस्त गढ़वाल - कुमाऊँ की एकमात्र इष्ट देवी 'नन्दा' ही है। इस पर्वतीय अंचल में नन्दा की पूजा और अर्चना जिस ढ़ंग से की जाती है -- वह अन्यत्र देखने में नहीं आती।

नैनीताल ते ताल की बनावट भी देखें तो वह आँख की आकृति का 'ताल' है। इसके पौराणिक महत्व के कारण ही इस ताल की श्रेष्ठता बहुत आँकी जाती है। नैनी (नंदा) देवी की पूजा यहाँ पर पुराण युग से होती रही है।

कुमाऊँ के चन्द राजाओं की इष्ट देवी भी नन्दा ही थी, जिकी वे निरन्तर यहाँ आकर पूजा करते रहते थे। एक जनश्रुति ऐसी भी कही जाती है कि चंदवंशीय राजकुमारी ननद नन्दा थी जिसको एक देवी के रुप में पूजी जाने लगी। परन्तु इस कथा में कोई दम नहीं है, क्योंकी समस्त पर्वतीय अंचल में नन्दा को ही इष्ट देवी के रुप में स्वीकारा गया है।

गढ़वाल और कुमाऊँ के राजाओं की भी नन्दा देवी इष्ट रही है। गढ़वाल और कुमाऊँ की जनता के द्वारा प्रतिवर्ष नन्दा अष्टमी के दिन नंदापार्वती की विसेष पूजा होती है। नन्दा के मायके से ससुराल भेजने के लिए भी 'नन्दा जात' का आयोजन गढ़वाल - कुमाऊँ की जनता निरन्तर करती रही है। अतः नन्दापार्वती की पूजा - अर्चना के रुप में इस स्थान का महत्व युग - युगों से आंका गया है। यहाँ के लोग इसी रुप में नन्दा के 'नैनीताल' की परिक्रमा करते आ रहे हैं।
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« Reply #27 on: October 13, 2007, 01:15:52 PM »

More about Nainital.

त्रिॠषि सरोवर :

'नैनीताल' के सम्बन्ध में एक और पौराणिक कथा प्रचलित है। 'स्कन्द पुराण' के मानस खण्ड में एक समय अत्रि, पुस्त्य और पुलह नाम के ॠषि गर्गाचल की ओर जा रहे थे। मार्ग में उन्हे#े#ं यह स्थान मिला। इस स्थान की रमणीयता मे वे मुग्ध हो गये परन्तु पानी के अभाव से उनका वहाँ टिकना (रुकना) और करना कठीन हो गया। परन्तु तीनों ॠथियों ने अपने - अपने त्रिशुलों से मानसरोवर का स्मरण कर धरती को खोदा। उनके इस प्रयास से तीन स्थानों पर जल धरती से फूट पड़ और यहाँ पर 'ताल' का निर्माण हो गया। इसिलिए कुछ विद्वान इस ताल को 'त्रिॠषि सरोवर' के नाम से पुकारा जाना श्रेयस्कर समझते हैं।

कुछ लोगों का मानना हे कि इन तीन ॠषियों ने तीन स्थानों पर अलग - अलग तोलों का निर्माण किया था। नैनीताल, खुरपाताल और चाफी का मालवा ताल ही वे तीन ताल थे जिन्हे 'त्रिॠषि सरोवर' होने का गौरव प्राप्त है।

नैनीताल के ताल की कहानी चाहे जो भी हो, इस अंचल के लोग सदैव यहाँ नैना (नन्दा) देवी की पूजा - अर्चना के लिए आते रहते थे। कुमाऊँ की ऐतिहासिक घटनाएँ ऐसा रुप लेती रहीं कि सैकड़ों क्या हजारों वर्षों तक इस ताल की जानकारी बाहर के लोगों को न हो सकी। इसी बीच यह क्षेत्र घने जंगल के रुप में बढ़ता रहा। किसी का भी ध्यान ताल की सुन्दरता पर न जाकर राजनीतिक गतिविधियों से उलढा रहा। यह अंचल छोटे छोटे थोकदारों के अधीन होता रहा। नैनीताल के इस इलाके में भी थोकदार थे, जिनकी इस इलाके में काफी जमीनें और गाँव थे।

सन् १७९० से १८१५ तक का समय गढ़वाल और कुमाऊँ के लिए अत्यन्त कष्टकारी रहा है। इस समय इस अंचल में गोरखाओं का शासन था। गोरखों ने गढ़वाली तथा कुमाऊँनी लोगों पर काफी अत्याचार किए। उसी समय ब्रिटिश साम्राज्य निरन्तर बढ़ रहा था। सन् १८१५ में ब्रिटिश सेना ने बरेली और पीलीभीत की ओर से गोरखा सेना पर आक्रमण किया। गोरखा सेना पराजित हुई। ब्रिटिश शासन सन् १८१५ ई. के बाद इस अंचल में स्थापित हो गया। २७ अप्रैल, १८१५ के अल्मोड़ा (लालमण्डी किले) पर ब्रिटिश झण्डा फहराया गया। अंग्रेज पर्वत - प्रेमी थे। पहाड़ों की ठण्डी जलवायु उनके लिए स्वास्थयवर्धक थी। इसलिए उन्होंने गढ़वाल - कुमाऊँ पर्वतीय अँचलों में सुन्दर - सुन्दर नगर बसाने शुरु किये। अल्मोड़ा, रानीखेत, मसूरी और लैन्सडाउन आदि नगर अंग्रेजों की ही इच्छा पर बनाए हुए नगर हैं।

सन् १८१५ ई. के बाद अंग्रेजों ने पहाड़ों पर अपना कब्जा करना शुरु कर दिया था। थोकदारों की सहायता से ही वे अपना साम्राज्य पहाड़ों पर सुदृढ़ कर रहे थे। नैनीताल इलाके के थोकदार सन् १८३९ ई. में ठाकुर नूरसिंह (नरसिंह) थे। इनकी जमींदारी इस सारे इलाके में फैली हुई थी। अल्मोड़ा उस समय अंग्रेजों की प्रिय सैरगाह थी। फिर भी अंग्रेज नये - नये स्थानों की खोज में इधर - उधर घूम रहे थे।

 

नए नैनीताल की खोज :

सन् १८३९ ई. में एक अंग्रेज व्यापारी पी. बैरन था। वह रोजा, जिला शाहजहाँपुर में चीनी का व्यापार करता था। इसी पी. बैरन नाम के अंग्रेज को पर्वतीय अंचल में घूमने का अत्यन्त शौक था। केदारनाथ और बद्रीनाथ की यात्रा करने के बाद यह उत्साही युवक अंग्रेज कुमाऊँ की मखमली धरती की ओर बढ़ता चला गया। एक बार खैरना नाम के स्थान पर यह अंग्रेज युवक अपने मित्र कैप्टन ठेलर के साथ ठहरा हुआ था। प्राकृतिक दृश्यों को देखने का इन्हें बहुत शौक था। उन्होंने एक स्थानीय व्यक्ति से जब 'शेर का डाण्डा' इलाके की जानकारी प्राप्त की तो उन्हें बताया गया कि सामने जो पर्वत हे, उसको ही 'शेर का डाण्डा' कहते हैं और वहीं पर्वत के पीछे एक सुन्दर ताल भी है। बैरन ने उस व्यक्ति से ताल तक पहुँचने का रास्ता पूछा, परन्तु घनघोर जंगल होने के कारण और जंगली पशुओं के डर से वह व्यक्ति तैयार न हुआ। परन्तु, विकट पर्वतारोही बैरन पीछे हटने वाले व्यक्ति नहीं थे। गाँव के कुछ लोगों की सहायता से पी. बैरन ने 'शेर का डाण्डा' (२३६० मी.) को पार कर नैनीताल की झील तक पहुँचने का सफल प्रयास किया। इस क्षेत्र में पहुँचकर और यहाँ की सुन्दरता देखकर पी. बैरन मन्त्रुमुग्ध हो गये। उन्होंने उसी दिन तय कर ड़ाला कि वे अब रोजा, शाहजहाँपुर की गर्मी को छोड़कर नैनीताल की इन आबादियों को ही आबाद करेंगे।

पी. बैरन 'पिलग्रिम' के नाम से अपने यात्रा - विवरण अनेक अखबारों को भेजते रहते थे। बद्रीनाथ, केदारनाथ की यात्रा का वर्णन भी उन्होंने बहुत सुन्दर शब्दों में लिखा था। सन् १८४१ की २४ नवम्बर को, कलकत्ता के 'इंगलिश मैन' नामक अखबार में पहले - पहले नैनीताल के ताल की खोज खबर छपी थी। बाद में आगरा अखबार में भी इस बारे में पूरी जानकारी दी गयी थी। सन् १८४४ में किताब के रुप में इस स्थान का विवरण पहली बार प्रकाश में आया था। बैरन साहब नैनीताल के इस अंचल के सौन्दर्य से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने सारे इलाके को खरीदन का निश्चय कर लिया। पी बैरन ने उस लाके के थोकदार से स्वयं बातचीत की कि वे इस सारे इलाके को उन्हें बेच दें।

पहले तो थोकदार नूर सिंह तैयार हो गये थे, परन्तु बाद में उन्होंने इस क्षेत्र को बेचने से मना कर दिया। बैरन इस अंचल से इतने प्रभावित थे कि वह हर कीमत पर नैनीताल के इस सारे इलाके को अपने कब्ज में कर, एक सुन्दर नगर बसाने की योजना बना चुके थे। जब थोकदार नूरसिंह इस इलाके को बेचने से मना करने लगे तो एक दिन बैरन साहब अपनी किश्ती में बिठाकर नूरसिंह को नैनीताल के ताल में घुमाने के लिए ले गये। और बीच ताल में ले जाकर उन्होंने नूरसिंह से कहा कि तुम इस सारे क्षेत्र को बेचने के लिए जितना रू़पया चाहो, ले लो, परन्तु यदि तुमने इस क्षेत्र को बेचने से मना कर दिया तो मैं तुमको इसी ताल में डूबो दूँगा। बैरन साहब खुद अपने विवरण में लिखते हैं कि डूबने के भय से नूरसींह ने स्टाम्प पेपर पर दस्तखत कर दिये और बाद में बैरन की कल्पना का नगर नैनीताल बस गया। सन् १८४२ ई. में सबसे पहले मजिस्ट्रेट बेटल से बैरन ने आग्रह किया था कि उन्हें किसी ठेकेदार से परिचय करा दें ताकि वे इसी वर्ष १२ बंगले नैनीताल में#ं बनवा सकें। सन् १८४२ में बैरन ने सबसे पहले पिरग्रिम नाम के कॉटेज को बनवाया था। बाद में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने इस सारे क्षेत्र को अपने अधिकार में ले लिया। सन् १८४२ ई. के बाद से ही नैनीताल एक ऐसा नगर बना कि सम्पूर्ण देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी इसकी सुन्दरता की धाक जम गयी। उत्तर प्रदेश के गवर्नर का ग्रीष्मकालीन निवास नैनीताल मेंं ही हुआ करता था। छः मास के लिए उत्तर प्रदेश के सभी सचिवालय नैनीताल जाते थे। 

नैनीताल में अनेक ऐसे स्थान हैं जहाँ जाकर सैलानी अपने - आपको भूल जाते हैं। यहाँ अब लोग ग्रीष्म काल में नहीं आते, बल्कि वर्ष भर आते रहते हैं। सर्दियों में बर्फ के गिरने के दृश्य को देखने हजारों पर्यटक यहाँ पहुँचते रहते हैं। रहने के लिए नैनीताल में किसी भी प्रकार की कमी नहीं है, एक से बढ़कर एक होटल हैं। आधुनिक सुविधाओं की नैनीताल में आज कोई कमी नहीं है। इसलिए सैलानी और पर्यटक यहाँ आना अधिक उपयुक्त समझते हैं।

नैनीताल में अप्रैल से जून और सितम्बर से दिसम्बर तक दो सीजन होते हैं। सम्पूर्ण देश के पूँजीपति, व्यापारी, उद्योगपति, राजा-महाराजा और सैलानी यहाँ आते हैं। इस मौसम में टेनिस, पोलो, हॉकी, फुटबाल, गॉल्फ, मछली मारने और नौका दौड़ाने के खेलों की प्रतियोगिता होती है। इन खेलों के शौकीन देश के विभिन्न नगरों से यहाँ आते हैं। पिकनिक के लिए भी लोगों का ताँता नगा रहता है। इसी मौसम में नाना प्राकर के सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते हैं। सितम्बर से दिसम्बर का मौसम भी बहुत सुन्दर रहता है। ऐसे समय में आकाश साफ रहता है। प्रायः इस मोसम में होटलों का किराया भी कम हो जाता है। बहुत से प्रकृति प्रेमी इसी मौसम में नैनीताल आते हैं। जनवरी और फरवरी के दो ऐसे महीने होते हैं जब नैनीताल में बर्फ गिरती है। बहुत से नवविवाहित दम्पतियाँ अपनी 'मधु यामिनी' हेतु नैनीताल आते हैं। तात्पर्य यह है कि यह सुखद और शान्ति का जीवन बिताने का मौसम है।

नैनीताल में घूमने के बाद सैलानी पीक देखना भी नहीं भूलते। आजकल नैनीताल के आकर्षण में रज्जुमार्ग (रोपवे) की सवारी भी विशेष आकर्षण का केन्द्र बन गयी है। सुबह, शाम और दिन में सैलानी नैनीताल के ताल में जहां बोट की सवारी करते हैं, वहाँ घोड़ों पर चढ़कर घुड़सवारी का भी आनन्द लेते हैं। शरद्काल में और ग्रीष्मकाल में यहाँ बड़ी रौनक रहती है। शरदोत्सव के समय पर नौकाचालन, तैराकी, घोड़ो का सवारी और पर्वतारोहम जैसे मनोरंजन और चुनौती भरे सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं।

नैनीताल में बहुत, अच्छे स्कूल भी हैं। योरोपियन मिशनरियों  के यहाँ कई स्कूल खुले हैं जिनमें से सेंट जोसेफ कॉलेज, शेरउड कॉलेज, सेन्टमेरी कॉन्वेंट स्कूल और आल सेन्ट स्कूल प्रसिद्ध है। बिरला का बालिका विद्यलय और बिरला पब्लिक स्कूल भी प्रसीद्ध है। नैनीताल में पॉलिटेकनिक है। नैनीताल में कुमाऊँ विश्वविद्यालय भी स्थापित है, जहाँपर हर प्रकार की शिक्षा दी जाती है। कुमाऊँ विश्वविद्यालय में नये - नये विष्य पढ़ाये जाते हैं। जिन्हें पढ़ाने के लिए देख के कोने - कोने से विद्यार्थी यहाँ आते हैं।

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« Reply #28 on: October 13, 2007, 01:16:17 PM »
यहाँ की सात चोटियों नैनीताल की शोभा बढ़ाने में विशेष, महत्व रखती हैं :

१.) चीनीपीक (नैनापीक)

सात चोटियों में चीनीपीक (नैनापीक) २,६०० मीटर की ऊँचाई वाली पर्वत चोटी है। नैनीताल से लगभग साढ़े पाँच किलोमीटर पर यह चोटी पड़ती है। इस चोटी से ह्मालय की ऊँची -ऊँची चोटियों के दर्शन होते हैं। यहाँ से नैनीताल के दृश्य भी बड़े भव्य दिखाई देते हैं। इस चोटी पर चार कमरे का लकड़ी का एक केबिन है जिसमें एक रेस्तरा भी है।

२.) किलवरी

२५२८ मीटर की ऊँचाई पर दूसरी पर्वत - चोटी है जिसे किलवरी कहते हैं। यह पिकनिक मनाने का सुन्दर स्थान है। यहाँ पर वन विभाग का एक विश्रामगृह भी है। जिसमें पहुत से प्रकृति प्रेमी रात्रि - निवास करते हैं। इसका आरक्षण डी. एफ. ओ. नैनीताल के द्वारा होता है।

३.) लड़ियाकाँटा

२४८१ मीटर की ऊँचाई पर यह पर्वत श्रेणी है जो नैनीताल से लगभग साढ़े पाँच किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ से नैनीताल के ताल की झाँकी अत्यन्त सुन्दर दिखाई देती है।

४ - ५.) देवपाटा और केमल्सबौग

यह दोनों चोटियाँ साथ - साथ हैं। जिनकी ऊँचाई क्रमशः २४३५ मीटर और २३३३ मीटर है। इस चोटी से भी नैनीताल और उसके समीप वाले इलाके के दृश्य अत्यन्त सुन्दर लगते हैं।

६. डेरोथीसीट

वास्तव में यह अयाँरपाटा पहाड़ी है परन्तु एक अंग्रेज केलेट ने अपनी पत्नी डेरोथी, जो हवाई जहाज की यात्रा करती हुई मर गई थी। की याद में इस चोटी पर #ेक कब्र बनाई, उसकी कब्र - 'डारोथीसीट' के नाम - पर इस पर्वत चोटी का नाम पड़ गया। नैनीताल से चार किलोमीटर की दुरी पर २२९० मीटर की ऊँचाई पर यह चोटी है।

७. स्नोव्यू और हनी - बनी

नैनीताल से केवन ढ़ाई किलोमीटर और २२७० मीटर की ऊँचाई पर हवाई पर्वत - चोटी है। 'शेर का डाण्डा' पहाड़ पर यह चोटी स्थित है, जहाँ से हिमालय का भव्य दृश्य साफ - साफ दिखाई देता है। इसी तरह स्नोव्यू से लगी हुई दूसरी चोटी हनी - बनी है, जिसकी ऊँचाई २१७९ मीटर है, यहाँ से भी हिमालय के सुन्दर दृश्य दिखाई देते हैं।

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« Reply #29 on: October 13, 2007, 01:16:59 PM »

IN AND AROUND NAINITAL

हनुमानगढ़ी :

नैनीताल में हनुमानगढ़ी सैलानी, पर्यटकों और धार्मिक यात्रियों के लिए विशेष, आकर्षण का केन्द्र हैै। यहाँ से पहाड़ की कई चोटियों के और मैदानी क्षेत्रों के सुन्हर दृश्य दिखाई देते हैं। हनुमानगढ़ी के पास ही एक बड़ी वेद्यशाला है। इस वेद्यशाला में नक्षरों का अध्ययन कियी जाता है। राष्ट्र की यह अत्यन्त उपयोगी संस्था है।

नैनीताल की सौन्दर्य - सुषमा अद्वितीय है। नैनीताल नगर भारत के प्रमुख नगरों से जुड़ा हुआ है। उत्तर - पूर्व रेलवे स्टेसन काठगौदाम से नैनीताल ३५ कि. मी. की दूरी पर स्थित है। आगरा, लखनऊ और बरेली को काठगोदाम से सीधे रेल जाती है।

हवाई - जहाज का केन्द्र पन्त नगर है। नैनीताल से पन्त नगर की दूरी ६० कि. मीटर है। दिल्ली से यहाँ के लिए हवाई यात्रा होती रहती है।

नैनीताल जिले में कई  स्थान ऐसै हैं, जहाँ बसों द्वारा आना - जाना रहता है। हल्द्वानी, काशीपुर, रुद्रपुर, रामनगर, किच्छा और पन्त नगर आदि नैनीताल में ऐसै उभरते हुए नगर हैं, जिनमें बसों के माध्यम से प्रतिदन सम्पर्क बना रहता है।

नैनीताल नगर निरन्तर फैलता ही जा रहा है। आज यह नगर ११ - ७३ वर्ग किलोमीटर में फैला हूआ है। पर्वतारोहण, पदारोहण जैसे आधुनिक आकर्षणों के कारण, यहाँ का फैलाव नित नये ढ़ंग से हो रहा है। 'कुमाऊँ' विश्वविद्यालय के मुख्यालय होने के कारण भी यहाँ नित नयी चहल - पहल होती है। नैनीतान में कई संस्थान हैं। पर्ववतारोहण की संस्था भी यहाँ की एक शान है।

नैनीताल नगर सुन्दर है। परन्तु नैनीताल जिले के अन्तर्गत ही कुछ ऐसे नगर और स्थल हैं जिनकी विशिष्टता नैनीताल से किसी भी प्रकार से कम नहीं है।

 

काठगोदाम : नैनीताल ते पर्वतीय अंचल का द्वार

काठगोदाम कुमाऊँ का द्वार है। यह छोटा सा नगर पहाड़ के पाद प्रदेश में बसा है। गौला नदी इसके दायें से होकर हल्द्वानी की ओर बढ़ती है। पूर्वोतर रेलवे का यह अन्तिम स्टेशन है। यहाँ से वरेली, लखनऊ तथा आगरा के लिए छोटी लाइन की रेल चलती है। काठगोदाम से नैनीताल, अल्मोड़ा, रानीखेत और पिथौरागढ़ के लिए के. एम. ओ. यू. की बसें जाती है। कुमाऊँ के सभी अंचलों के लिए यहाँ से बसें जाती हैं।

काठगोदाम से तीन किलोमीटर नैनीताल की ओर बढ़ने पर रानीबाग नामक अत्यन्त रमणीय स्थल है। कहते हैं यहाँ पर मार्कण्डेय ॠषि ने तपस्या की थी।रानीबाग के समीप ही पुष्पभद्रा और गगार्ंचल नामक दो छोटी नदियों का संगम होता है। इस संगम के बाद ही यह नदी 'गौला' के नाम से जानी जाती है। गौला नदी के दाहिने तट पर चित्रेश्वर महादेव का मन्दिर है। यहाँ पर मकर संक्रान्ति के दिन बहुत बड़ा मेला का आयोजन होता है।

'रानीबाग' से पहले इस स्थान का नाम चित्रशिला था। कहते हैं कत्यूरी राजा पृथवीपाल की पत्नी रानी जिया यहाँ चित्रेश्वर महादेव के दर्शन करने आई थी। वह बहुत सुन्दर थी। रुहेला सरदार उसपर आसक्त था। जैसे ही रानी नहाने के लिए गौला नदी में पहुँची, वैसे ही रुहेलों की सेना ने घेरा डाल दिया। रानी जिया शिव भक्त और सती महिला थी। उसने अपने ईष्ट का स्मरण किया और गौला नदी के पत्थरों में ही समा गई। रुहेलों ने उन्हें बहुत ढूँढ़ा परन्तु वे कहीं नहीं मिली। कहते हैं, उन्होंने अपने आपको अपने घाघरे में छिपा लिया था। वे उस घाघरे के आकार में#ं ही शिला बन गई थीं। गौला नदी के किनारे आज भी एक ऐसी शिला है, जिसका आकार कुमाऊँनी घाघरे के समान हैं। उस शिला पर रंग-विरंगे पत्थर ऐसे लगते हैं - नानो किसी ने रंगीन घाघरा बिछा दिया हो। वह रंगीन शिला जिया रानी के स्मृति चिन्ह माना जाता है। रानी जिया को यह स्थान बहुत प्यारा था। यहीं उसने अपना बाग लगाया था और यहीं उसने अपने जीवन की आखिरी सांस भी ली थी। वह सदा के लिए चली गई परन्तु उसने अपने गात पर रुहेलों का हाथ नहीं लगन् दिया था। तब से उस रानी की याद में यह स्थान रानीबाग के नाम से विख्यात है।

आज रानीबाग कुमाऊँ का औद्योगिक स्थान भी हो गया है। यहाँ पर घड़ी उद्योग लग चुका है। यह उद्योग हिन्दुस्तान मशीन दूल्स (एच. एम. टी.) का पाँचवा उद्योग है। रानीबाग में सेना (पुलिस) का चेकपोस्ट भी है। यह अत्यन्त रमणीय स्थान है।

रानीबाग से दो किलोमीटर जाने पर एक दोराहा है। दायीं ओर मुड़ने वाली सड़क भीमताल को जाती है। जब तक मोटर - मार्ग नहीं बना था, रानीबाग से भीमताल होकर अल्मोड़ा के लिए यही पैदल रास्ता था। वायीं ओर का राश्ता ज्योलीकोट की ओर मुड़ जाता है। ये दोनों रास्ते भुवाली में जाकर मिल जाते हैं।

रानीबाग से सात किलोमीटर की दूरी पर 'दोगाँव' नामक एक ऐसा स्थान है जहाँ पर सैलानी ठण्डा पानी पसन्द करते हैं। यहाँ पर पहाड़ी फलों का ढेर लगा रहता है। पर्वतीय अंचल की पहली बयार का आनन्द यहीं से मिलना शुरु हो जाता है।

ज्योलीकोटः काठगोदाम से १७.७ किलोमीटर की दूरी पर ज्योलीकोट स्थित है। यहाँ से नैनीताल की दूरी प्रायः १७.७ कि. मी. ही शेष बच जाती है। अर्थात् यह स्थान काठगोदाम और नैनीताल के बीचोंबीच स्थित है। कुमाऊँ के सुन्दर स्थलों में ज्योलीकोट की गणना की जाती है। यह स्थान समुद्र की सतह से १२१९ मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। यहाँ का मौसम गुलाबी मौसम कहलाता है। जो पर्यटक नैनीताल की ठण्डी हवा में नहीं रह पाते, वे ज्योलिकोट में रहकर पर्वतीय जलवायु का आनन्द लेते हैं। ज्योलिकोट में मधुमक्खी पालन केन्द्र है। फलों के लिए तो ज्योलिकोट प्रसिद्ध है ही परन्तु विभिन्न प्रकार के पक्षियों के केन्द्र होने का भी इस स्थान को गौरव प्राप्त है। देश - विदेश के अनेक प्रकृति - प्रेमी यहाँ रहकर मधुमक्खियों और पक्षियों पर शोध कार्य करते हैं। सैलानी, पदारोही और पहाड़ों की ओर जाने वाले लोग यहाँ अवश्य रुकते हैं।

ज्योलिकोट से जैसे ही बस आगे बढ़ती है, वैसे ही एक दोराहा और आ जाता है। बायीं ओर मुड़ने वाला मार्ग नैनीताल जाता है और दायीं ओर का मार्ग भुवाली होकर अल्मोड़ा, मुक्तेश्वर, रानीखेत और कर्ण प्रयाग की तरफ चला जाता है।

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