शंकर सिंह भाटिया, देहरादून: विकास की जिन उम्मीदों को लेकर उत्तराखंड राज्य की मांग की गई थी, नौ साल बाद उसके नतीजे और भयावह दिखाई दे रहे हैं। राज्य के अंदर ही पहाड़ और मैदान के बीच विकास की खाई और चौड़ी होती चली जा रही है। पहाड़ विकास में पीछे छूटता चला जा रहा है। मैदान विकास के नए प्रतिमान छू रहा है। विकास में चौड़ी होती खाई की बात राज्य सरकार की विभिन्न एजेंसियों से प्राप्त आंकड़ों से साबित हो रही है। पर्वतीय जिलों में सिर्फ 60 प्रतिशत गांव सड़क से जुड़ पाए हैं, जबकि मैदानी जिलों के शत प्रतिशत गांव कनेक्टेड हैं। यदि कृषि उत्पाद से प्रति व्यक्ति आय की बात करें तो पौड़ी जिले में यह एक हजार रुपये से नीचे है, जबकि ऊधमसिंह नगर जिले में दो लाख रुपये से अधिक है। प्रति एक लाख व्यक्तियों पर टेलीफोन कनेक्शन की बात करें तो बागेश्र्वर जिले में एक लाख लोगों पर 1400 से कम कनेक्शन हैं, जबकि नैनीताल और देहरादून जिले में 8000 से अधिक हैं। उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, बागेश्र्वर और अल्मोड़ा जिलों में प्रति व्यक्ति विद्युत खपत सौ किलोवाट से कम है, देहरादून में यह 936 किलोवाट और हरिद्वार में 416 किलोवाट है। उद्योग और सेवा क्षेत्र में काम करने वाले हाथों की बात की जाए तो रुद्रप्रयाग और अल्मोड़ा में 27-27 प्रतिशत, बागेश्र्वर और उत्तरकाशी में 24-24 प्रतिशत हैं। देहरादून जिले में 78 प्रतिशत, हरिद्वार में 71 प्रतिशत, ऊधमसिंह नगर में 66 प्रतिशत और नैनीताल में 58 प्रतिशत लोग उद्योग और सेवा क्षेत्र में कार्यरत हैं। व्यावसायिक कृषि की तस्वीर और भी अंतर पैदा करने वाली है। बागेश्र्वर जिले में सिर्फ पांच प्रतिशत खेती व्यावसायिक होती है, जबकि हरिद्वार में यह 50 प्रतिशत है। पहाड़ी जिले पूरी तरह उद्योग शून्य हैं, जबकि राज्य के सभी शत प्रतिशत बड़े उद्योग मैदानी क्षेत्रों में हैं।
साभार- दैनिक जागरण