Author Topic: Folk Games Of Uttarakhand - उत्तराखण्ड की लोक क्रीड़ायें  (Read 1367 times)

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Online पंकज सिंह महर

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ठिणी-दाबुली THINI-DABULI

यह गुल्ली डंडा का उत्तराखण्डी वर्जन है, इसमें एक ठिणी बनाई जाती है, जो लकड़ी की बनी होती है और इसके दोनों छोर नुकीले होते हैं, दाबुली भी लकड़ी से बनाई जाती है और इसका निचला छोर थोड़ा छिला होता है। किसी चौरस मैदान में एक छोटा सा गढ़्ढा बनाया जाता है और सभी खिलाड़ी सर्वमान्य तरीके से पहले खिलाड़ी को चुन लेते हैं। पहला खिलाड़ी ठिणी को गढ़्ढे के ऊपर रखकर दाबुली से उसे उछालता है, अगर उसके द्वारा उछाली गई ठिणी किसी अन्य खिलाड़ी द्वारा कैच कर ली जाती है तो वह आउट हो जाता है। अगर कोई ठिणी को पकड़ नहीं पाता खिलाड़ी अपनी दाबुली को गढ्ढे के ऊपर रख देता है और प्रतिद्वन्दी खिलाड़ी ठिणी को दाबुली के ऊपर फेंकने का प्रयास करता है। अगर ठिणी दाबुली के ऊपर गिरती है तो खिलाड़ी आऊट, अन्यथा खिलाड़ी गढ्ढे से ठिणी तक की दूरी को दाबुली से नापता है, जितनी दाबुली, उतने की प्वाइंट.....इस खेल के कई अन्य नियम भी हैं, जो मैं भूल रहा हूं, फाउल होने पर भी खिलाड़ी को अतिरिक्त मौका दिया जाता है, जिसमें वह ठिणी को ऊपर-ऊपर ही उछालता है और जितनी बार उछाल ले, उतने प्वाइंट और उसे मिलते हैं।

और भी कुछ था, झार्रो, बांछो, सेमल्या, सिल्टो जैसा कुछ, किसी को याद आए तो जरुर शेयर करें।
यो नै हुन, ऊ नै हुन! कै बेर, कै नै हुन|
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Offline dajyu/दाज्यू

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ये खेल तो हमने भी बहुत खेला ठहरा. केवल महिलायें ही क्यों दाज्यू भी जानकार ठहरे इसके तो.

इसमें पांच दाणि (छोटे छोटे सुडौल पत्त्थर) होती है. पहले पाचों को नीचे गिराया जाता है. फिर एके पत्थर को ऊपर उछाल कर उसके नीचे गिरने से पहले एक पत्थर हाथ में उठाया जाता है और उछाले गये पत्थर को कैच कर लिया जाता है. यदि पत्थर गिर गया तो आउट. इसी प्रकार सभी चार पत्थर उठाये जाते है. फिर यही प्रक्रिया एक साथ दो , तीन और चार पत्थरों को उठाने के लिये भी की जाती है.

इसके बाद आता है कोठा. इसमें बांये हाथ को जमीन में रख के कोठरी सी बनाते हैं. सारे पत्थरों को नीचे गिरा लेते हैं. फिर एक पत्थर को ऊपर उछाल कर सारे पत्त्थर एक एक कर कोठे में डालने होते हैं.

फिर कुत्ता . ..अंगूठे और पहली दूसरी ऊंगली को एक दूसरे पर चढ़ाकर बीच की जगह में से एक एक कर सारे पत्थर निकाल लेते है..


लास्ट में होता है मुट्ठा..अभी इतन ही...कभी खेलना हो तो आ जाना हो मेरे पहाड़ में...
गुट्टी/पांछि/दाणि

यह मुख्यतः महिलाओं का खेल है, इस खेल को पांच छोटे-छोटे पत्थरों से खेला जाता है, इस खेल को पत्थर उछाल-उछाल कर खेला जाता है। जिसमें से चार पत्थर हाथ में रहते हैं और एक नीचे, जो ऎसा नहीं कर पाता या जिससे पत्थर गिर जाते हैं, वह हार जाती है। कोई महिला सदस्य ही इसकी और डिटेल दे पायेगी।


गुणों में सौ गुण भरिया, म्यारा पहाड़्क नान्तिनों,
ये दुनिया में गुणै चाइंनी, म्यारा पहाड़्क नान्तिनो॥

Online पंकज सिंह महर

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ये खेल तो हमने भी बहुत खेला ठहरा. केवल महिलायें ही क्यों दाज्यू भी जानकार ठहरे इसके तो.



दाज्यू,
      जै हो तुमरी, वैसे आप उत्तराखण्ड की जानकारे के मामले में सबके बड़बाज्य़ू ठैरे,

इस खेल की इतनी प्रमाणिक जानकारी देने के लिये आपका भौत-भौत धन्यवाद ठैरा और +१ कर्मा ले।

****बौजी से पूछ कर लिखा या आपने वास्तव में खेला है.... ;D ;D ;D ;)
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Online Lalit Mohan Pandey

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Ek khel tha pattar fekne ka, Isme do ladke ek hi jagah khade ho kar, asman ki taraf pattar uchalte hai, jiska pattar jyada ucha gaya wo jeet jata hai (pathar size mai saman hone chahiye)...
Ek aesa hi khel or hai, kagaj ka hawayi jahaj banane ka, fir usko udate the..jiska jyada door tak uda wo jeet gaya.. usko udane ke liye kisi uchi jagah pe jate the fir kagaj ke jahaj mai fook mar kar hawa mai uda dete hai...
हे गोरिल देवता..! मेरा पहाड़स शराब भटी बचो..

Online हेम पन्त

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पहाङों में पारम्परिक रुप से खेले जाने वाले खेल तो अब टी.वी. और वीसीडी आने के बाद लगभग खतम हो गये है. अड्डू, पिड्डू, आइस-पाइस, धप्पी, गुलेल, गिल्ली-डण्डा (ठिणी-दाबुली), ढड्यालूं की बन्दूक, नदियों में तैराकी जैसे खेल, क्रिकेट और कुछ हद तक फुटबाल की छाया में लुप्त हो गये हैं.

ढड्यालूं की बन्दूक-
ढढ्यालू एक कंटीला पौधा होता है, इसकी पतली डालियां अन्दर से खोखली बनाई जा सकती हैं. इस खोखली नाल में ढढ्यालू के बीज या कागज आदि डाल कर पीछे से एक डण्डे से इसे धकेलने पर यह तेजी से बाहर आता है-आवाज के साथ. यह कतई घातक नही होता, एक हल्का-फुल्का मनोरंजन भर है. अब शायद ही यह खेल कोई खेलता होगा.
मैंने न कभी देखा तुमको, पर प्राण तुम्हारी वह छाया- जो रहती है मेरे उर में, वह सुन्दर है पावन सुन्दर!  कविवर चन्द्र कुंवर बर्त्वाल

Online एम.एस. मेहता /M S Mehta

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मुर्गा झाबेटी

जैसे की नाम से स्पष्ट होता है तो लोगो की टक्कर (झाबेटी) !  बचपन यह खेल भी प्रसिद्ध था! यह  खेल एक पाँव को बांध कर और हाथ छाती में (शर्ट पकडे हुए) एक दुसरे को कुछ दूरी से एक पाँव से jump करते हुए टक्कर करते है ! जो पहले दुसरे को जमीन में गिरता है वही विजयी होता है !

यह एक बचपन के खेल है !
"जय १००८ मूल मूलनारायण जी की जय हो" !!
 

Offline Himanshu Pathak

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FurFuri...

Bhaang ke Dando Se Furfuri bnaana.. Fit use lekar patkan me daudnaa...

लुकी छिपी बादवो में चमकी जैसी ज्यून तेरो मुख चमको
तेरा रसीला होठो बे आज मौ जै टपको

Online Lalit Mohan Pandey

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Ek khel hota tha, usme mote se wire ko ya fir patli Iron rod ko mod ke ek bada sa pahiya banaya jata tha (lagbhag cycle ki tyre ke barabar bada), or ek wire ke handle ke sahare uske balance karte hue chalana hota tha, ek bar pahiye ko ludka diya jata the uske bad use wire (jise ki handle) kahte the uske sahare hi control karte the.

हे गोरिल देवता..! मेरा पहाड़स शराब भटी बचो..

Online negi sunder poet

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धिरपातई

इस खेल को दो लोग खेलते है इसे कई तरहो से खेलते है। यानी धिरपातई के बोल के अनुसार जैसे की एक झना बैठा है और एक खडा है दौने एक दुसरे के हाथ पकड रखे है। (यह सास बहु की धिरपातई है)

बहु- उठो सासु,
सास- कुटो धान,

यह इसी क्रम मे चलता रहता है। इसी तरहै और भी गाई जाती है।
बुरा होकर भी मै, बुराई नही करता।

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गाडी खेल

यानी सडकै बनाकर उनके उपर पत्थरो की गाडीया चलाना।
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घिरोडी
यानी किसी लकडी का एक गोला बनाकर उसमे दो छेद करके फिर उसमे डोरी डालकर फिर खुब गोल घुमाकर हल्का हल्का खिचते है। और वह घुर घुर की आवाज निकालता है।
बुरा होकर भी मै, बुराई नही करता।

Online Lalit Mohan Pandey

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Ek khel tha jo ham log bhi bahut khelte the, per uska nam yaad nahi aa raha hai...

Isme 6-7 log ek line mai baithate hai kuch kuch doori mai jaise 3-4 feet se le ke 10-10 feet tak (depends baithate ke liye kitne bachhe hai) or do log khade rahte hai jisme ek bhagta hai or doosre pakadne wala hota hai...Baithane walu mai har karmasah ek doosre ke opposite hota hai..mana pahle wale ka muh poorab ki or hai to doosre ka muh pashchim ki or hoga..fir teesre ka muh poorab or chaithe ka pashchim ki or.. and yahi kram chalta rahta hai....

Do log jo khade hote hai usme pahle wala bhagta hai or doosre usko pakadne ke liye uske peeche bhagta hai... jo pakadne wala hota hai wo kisi bhi baithe hue bande ke peeth mai hath laga ke uski jagah baith sakta hai..or wah apne muh ki direction mai bhagta hua ..doosre ko pakadne ki kosis karta hai.. 
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Online Lalit Mohan Pandey

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Achcha yad aya..is khel ko "kho-kho" kaha jata tha... or school level ki partiyogitau mai bhi ye khela jata tha....
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eska naam (kho kho) kahate hai

Ek khel tha jo ham log bhi bahut khelte the, per uska nam yaad nahi aa raha hai...

Isme 6-7 log ek line mai baithate hai kuch kuch doori mai jaise 3-4 feet se le ke 10-10 feet tak (depends baithate ke liye kitne bachhe hai) or do log khade rahte hai jisme ek bhagta hai or doosre pakadne wala hota hai...Baithane walu mai har karmasah ek doosre ke opposite hota hai..mana pahle wale ka muh poorab ki or hai to doosre ka muh pashchim ki or hoga..fir teesre ka muh poorab or chaithe ka pashchim ki or.. and yahi kram chalta rahta hai....

Do log jo khade hote hai usme pahle wala bhagta hai or doosre usko pakadne ke liye uske peeche bhagta hai... jo pakadne wala hota hai wo kisi bhi baithe hue bande ke peeth mai hath laga ke uski jagah baith sakta hai..or wah apne muh ki direction mai bhagta hua ..doosre ko pakadne ki kosis karta hai..  

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